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आश्विन मास :यह महीना पितरों और देवी को समर्पित होता है।।

आश्विन मास :यह महीना पितरों और देवी को समर्पित होता है, यानी इस महीने में पितृ और देवी पूजा का विशेष महत्व 
-आश्विन मास में सूर्य जब कन्या राशि में प्रवेश करते हैं तो उस समय सूर्य का प्रभाव कम हो जाता है और पितृ आत्माओं का प्रभाव बढ़ता है

आश्विन मास इस साल 11 सितंबर से शुरू हो गया है और नौ अक्तूबर को शरद पूर्णिमा के दिन इस महीने का समापन होगा। सनातन धर्म के पंचांग के अनुसार आश्विन मास सातवां महीना माना जाता है। यह महीना पितरों और देवी को समर्पित होता है, यानी इस महीने में पितृ और देवी पूजा का विशेष महत्व माना गया है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को श्राद्ध या कनागत का महीना का जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक 16 दिन का पितृपक्ष होता है जिसमें सनातनी धर्मावलंबी अपने अपने पितृजनों की निर्वाण की तिथि के दिन उनका श्राद्ध करते हैं। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को सर्व पितृ विसर्जन अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पितृजन पृथ्वी लोक से पितृलोक के लिए प्रस्थान करते हैं। आश्विन मास का कृष्ण पक्ष 10 सितंबर से शुरू होकर 25 सितंबर तक चलेगा। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को श्राद्ध या कनागत का पक्ष कहा जाता है।ज्योतिषाचार्य पंडित यशोधर झा बताते हैं कि अश्विन मास में चंद्रमा का पृष्ठ भाग जो पितृलोक माना जाता है, वह पृथ्वी के सबसे अधिक निकट होता है। इसी कारण आश्विन माह के कृष्ण पक्ष के 16 दिनों में पितृजन पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने कुटुंब जनों के घर में पधारते हैं। सनातनी हिंदू धर्मावलंबी अपने अपने पितृजनों के सम्मान में आस्था पूर्वक श्राद्ध करते हैं। श्रद्धा पूर्वक अपने पितृजनों की पूजा-अर्चना करने को श्राद्ध कहते हैं। आश्विन मास में सूर्य जब कन्या राशि में प्रवेश करते हैं तो उस समय सूर्य का प्रभाव कम हो जाता है और पितृ आत्माओं का प्रभाव बढ़ता है। वह और भी बलवती हो जाती हैं, इसलिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को कनागत भी कहा जाता है यानी सूर्य का कन्या राशि में आगमन होता है।
लोक भाषा में आश्विन मास को लेकर एक बात बहुत प्रचलित है, आए कनागत फूले कास यानी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जंगल में कास के पेड़ों में सफेद रंग के फूल खिलते हैं। इन फूलों के खिलने से आश्विन मास के शुरू होने की प्रकृति द्वारा सूचना दी जाती है, जहां आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितृ जनों की सेवा और श्रद्धा भाव से पूजा करने में व्यतीत होता है वही आश्विन मास का शुक्ल पक्ष शारदीय नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है जिसमें दुर्गा देवी के सभी 9 अवतारों की पूजा की जाती है और इसका समापन विजयादशमी के दिन होता है।

आश्विन मास का शुक्ल पक्ष व्रत-त्योहारों की दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस महीने कई प्रमुख व्रत-त्योहार होते हैं। शुरुआत में पितृपक्ष होगा, जिसमें दान-धर्म के कार्य किए जाएंगे। मध्य में शारदीय नवरात्र आएंगे जबकि आखिर में शरद पूर्णिमा और विजयदशमी जैसे व्रत-त्योहार रहेंगे। 26 सितंबर से शारदीय नवरात्र का प्रारंभ होगा। 2 अक्तूबर को कालरात्रि सप्तमी तिथि के दिन देवी की रात्रि भर पूजा की जाएगी जो तंत्र साधकों के लिए सबसे सर्वश्रेष्ठ तिथि मानी जाती है। तीन अक्तूबरर को महाअष्टमी का त्योहार मां देवी के पूजा अर्चना के साथ मनाया जाएगा और चार अक्तूबर को महानवमी के साथ शारदीय नवरात्र का समापन होगा।

पांच अक्तूबर को विजयदशमी के दिन रावण वध के साथ सत्य पर असत्य की विजय का त्योहार मनाया जाएगा। नौ अक्तूबर को शरद पूर्णिमा और बाल्मीकि जयंती मनाई जाएगी। शरद पूर्णिमा से दीपावली का आगमन शुरू हो जाता है और जो कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और उससे जो प्रकाश आता है वह अमृत समान माना जाता है और सनातन धर्म के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि को दूध और चावल से बनी हुई खीर चंद्रमा की रोशनी में रखी जाती है और चंद्रमा से निकलने वाली किरणें उस खीर को अमृत्तुल्य बना देती हैं।

आश्विन मास में ग्रहों के राजा सूर्य देव की उपासना से बड़ा लाभ मिलता है। इस महीने दान, धर्म के कार्य करने से भी बड़ा लाभ होता है। आश्विन माह में घी का दान सबसे उत्तम माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार आश्विन महीने में करेले का सेवन नहीं करना चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। रिपोर्ट अशोक झा

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