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जिन्होंने 9 साल की उम्र में उन्होंने छोड़ा था अपना घर 

जिन्होंने 9 साल की उम्र में उन्होंने छोड़ा था अपना घर 
-स्वरूपानंद सरस्वती 19 साल की उम्र में ‘क्रांतिकारी साधु’ भी कहे जाने लगे
-स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय स्वरूपानंद सरस्वती को उन दिनों जेल में भी जाना पड़ा था
अशोक झा, सिलीगुड़ी: हिंदुओं के सबसे बड़े धर्मगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का निधन होने से उनके शिष्यों में शोक की लहर है। बताया जाता है कि 9 साल की उम्र में उन्होंने अपना घर छोड़ा था। इसके बाद वो काशी पहुंचे। काशी में उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा हासिल की। एक बात यह भी है कि महज नौ साल की उम्र में घर छोड़ने वाले स्वरूपानंद सरस्वती 19 साल की उम्र में ‘क्रांतिकारी साधु’ भी कहे जाने लगे। दरअसल जब 1942 में देश में अंग्रेज भारत छोड़े का नारा बुलंदियों पर था तब स्वरूपानंद सरस्वती भी देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उस वक्त उनकी उम्र महज 19 साल थी। उसी वक्त उन्हें क्रांतिकारी साधु भी कहा गया। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय स्वरूपानंद सरस्वती को उन दिनों जेल में भी जाना पड़ा था।उन्होंने वाराणसी की जेल में नौ और मध्य प्रदेश की जेल में 6 महीने की सजा भी काटी है। वो करपात्री महाराज की राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे। सन् 1940 में वे दंडी संन्यासी बनाये गए और 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली। 1950 में शारदा पीठ शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने झोतेश्वर धाम में अंतिम सांस ली है। 99 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। अंतिम समय में शंकराचार्य के अनुयायी और शिष्य उनके साथ थे। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के भक्त विदेश में भी हैं। बताया जाता है कि करीब 1300 साल पहले आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ने हिंदुओं और धर्म के अनुयायी को संगठित करने और धर्म के उत्थान के लिए पूरे देश में 4 धार्मिक मठ बनाए थे। इन चार मठों में से एक के शंकराचार्य जगतगुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती थे, जिनके पास द्वारका मठ और ज्योतिर मठ दोनों थे।
नहीं रहे हिंदुओं के सबसे बड़े धर्मगुरू: 
स्वरूपानंद सरस्वती को हिंदुओं का सबसे बड़ा धर्मगुरु माना जाता था। कुछ दिन पहली ही स्वरूपानंद सरस्वती ने हरियाली तीज के दिन अपना 99वां जन्मदिन मनाया था, जिसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत कई बड़े नेता पहुंचे थे। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य ब्रह्म विद्यानंद के मुताबिक, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को सोमवार शाम 5 बजे परमहंसी गंगा आश्रम में समाधि दी जाएगी।
कौन हैं शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती?
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम पोथीराम उपाध्याय था। 9 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ धर्म की यात्रा शुरू कर दी थी। इस दौरान वो उत्तर प्रदेश के काशी पहुंचे और ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज से शास्त्रों की शिक्षा ली।
72 साल पहले ली थी दंड दीक्षा
स्वामी स्वरूपानंद आज से 72 साल पहले यानी 1950 में दंडी संन्यासी बनाए गए थे। ज्योर्तिमठ पीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे। उन्हें 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली।
आजाद की लड़ाई में रहा योगदान : 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में स्वामी स्वरूपानंद भी शामिल थे। सिर्फ 19 साल की उम्र में वो क्रांतिकारी साधु के रूप में प्रसिद्ध हुए। वो 15 महने तक वाराणसी और मध्यप्रदेश की जेलों में रहे।
बीजेपी-विहिप को फटकारा था : 
शंकराचार्य स्वामी स्परूपानंद सरस्वती ने राम जन्मभूमि न्यास के नाम पर विहिप और भाजपा को घेरा था। उनका कहना था कि अयोध्या में मंदिर के नाम पर भाजपा-विहिप अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं, जबकि मंदिर का एक धार्मिक रूप होना चाहिए, लेकिन ये लोग इसे राजनीतिक रूप देना चाहते हैं और ये हमें मंजूर नहीं है। रिपोर्ट अशोक झा

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