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हर्षउल्लास के साथ मनाया गया संवत्सरी पर्व

हर्षउल्लास के साथ मनाया गया संवत्सरी पर्व 
-साधु-साध्वी व श्रावक-श्राविकाएं करते हैं अधिक से अधिक धर्म-ध्यान और  त्याग व तपस्या 
-सात दिन त्याग, तपस्या, शास्त्र श्रवण व धर्म-आराधना के साथ मनाने के बाद आठवें दिन को महापर्व के तौर पर मनाया जाएगा
अशोक झा सिलीगुड़ी: श्वेताम्बर  जैन स्थानकवासी भाद्र मास की शुक्ल पंचमी को संवत्सरी पर्व के रूप में मनाते हैं। इसे पर्युषण पर्व भी कहा जाता है। सात दिन त्याग, तपस्या, शास्त्र श्रवण व धर्म-आराधना के साथ मनाने के बाद आठवें दिन को महापर्व के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन साधु-साध्वी व श्रावक-श्राविकाएं अधिक से अधिक धर्म-ध्यान और  त्याग व तपस्या करते हैं। एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं और दूसरों को क्षमा करते हुए मैत्रीभाव की ओर कदम बढ़ाते हैं। दिनाक 31 अगस्त 2022 को तेरापंथ भवन सोमानी मिल कंपाउंड में मुमुक्षु बहनों के पावन सान्निध्य में सुबह 9 बजे से संवत्सरी महापर्व का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ नमोंकार महामंत्र के साथ किया गया। मुमुक्षु प्रेक्षा बहन ने भगवान महावीर के बारे में अपना प्रवचन रखा। मुमुक्षु
 राहत बहन ने संवत्सरी पर्व के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की। बताया कि धर्म के अनुसार घड़ी की सुई के समान है कालचक्र की सुई भी एक बार नीचे की ओर और फिर ऊपर की ओर चलती है। इस आधार पर यहां काल को (अवसर्पिणी काल व उत्सर्पिणी काल) दो वर्गों में बांटा गया है। अवसर्पिणी काल में जहां ऊपर से नीचे उतरते हुए धर्म की हानि हो रही होती है। वहीं उत्सर्पिणी काल में हम घोरतम दुख की ओर से धर्म व सुख की ओर बढ़ते हैं। काल का पहला आरा ‘दुखम दुखम’ के समाप्त होने के बाद दूसरे चरण के प्रारंभ में प्रकृति का रुख मुड़ने लगता है। भीषण गर्मी से तप्त धरती पर मेघों की बरसात होती है। 49वें दिन तक यह बरसात धरती को हरा-भरा कर देती है। मानव जाति पहली बार प्रकृति के इस सौम्य रूप से परिचित होती है। और तब सब मिल कर यह निर्णय करते हैं कि आज हम मांसाहार नहीं करेंगे। अहिंसा, प्रेम, सद्भावना भाइचारे का वह मंगलकारी दिन ही संवत्सरी के रूप में मनाया जाता है। जैन समाज चातुर्मास प्रारंभ होने के 50वें दिन इस पर्व को मनाता है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि पहले सात सप्ताहों में आंतरिक शुद्धि करते हुए 50वें दिन पूर्ण शुद्धि तक पहुंचने का प्रयास है संवत्सरी। जो लोग शुरुआत से धर्म ध्यान नहीं करते, वे पर्युषण के आठ दिनों में अपनी अंतर्यात्रा की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। अगर किसी कारणवश इन आठ दिनों में भी आत्म जागरण न कर सकें तो संवत्सरी के आठ प्रहरों में सात प्रहर धर्म आराधना करते है।  आठवें प्रहर में आत्मबोध
के महासागर में डुबकी लगाई जा सकती है। जैन मंडल द्वारा आज के पर्व पर एक गीतिका का संज्ञान किया गया।महिला मंडल की बहिनों ने सोलह सतियो के ऊपर एक बहुत ही सुंदर नाटिका की प्रस्तुति दी सभी उपस्थित श्रावको ने ॐ अर्हम की ध्वनि से उसका स्वागत किया। उसके बाद तपस्वियों भाई बहिनों के तप का अभिनंदन सभी सस्थाओ द्वारा भावों एवं फ़ोटो साहित्य देकर किया। सभी तपस्वियों के परिवारों जनों ने उनके तप की अनुमोदना भावों और गीतिका के माध्यम से किया।अन्य सभी सावन भादो एकासन, मोन अठाई,वर्षीतप, तपस्वियों को भी साहित्य देकर अभिनंदन किया गया।उसके पश्चात मुमुक्षु मीनल बहन ने भी आज के विषय पर अपने सारगर्भित विचार रखे। मुमुक्षु वीनू बहन ने भी बहुत ही सुंदर रूप से आज के विषय पर प्रकाश डाला। सुमन सेठिया ने एक गीत की प्रस्तुति दी। संघ गीत के साथ आज का कार्यक्रम को सम्पन्न किया गया,सायंकालीन संवत्सरी प्रतिक्रमण सामूहिक रूप से किया गया। काफी श्रावको ने आठ,छह,चार पहरी पोषध लिया। काफी संख्या में श्रावकगण कि उपस्थिति थी सभी मे उल्लास का माहौल नजर आ रहा था। पर्व का सीधा अर्थ है उत्सव। त्योहार या हंसी-खुशी का कोई विशेष दिन या समय। सालभर में कोई न कोई समय ऐसा आता रहता है, जब लोग खूब खुशियां मनाते हैं। कभी रंगों से खेलते हैं, कभी दीये जलाकर रोशनी फैलाते हैं। कभी हथियारों की पूजा करते हैं तो रक्षा का वचन देते हैं। अपनों की लंबी उम्र और परिवार के सुख के लिए व्रत रखने के दिन भी आते हैं। इसी कड़ी में जैन धर्म में पर्युषण को महापर्व का दर्जा दिया गया है। रिपोर्ट अशोक झा

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