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श्रीकृष्णजन्माष्टमी  आज व कल,श्रीकृष्ण तो एक पर उनके रूप अनेक

श्रीकृष्णजन्माष्टमी  आज व कल,श्रीकृष्ण तो एक पर उनके रूप अनेक
– देश विदेश में मनाई जाती है कृष्ण की जन्माष्टमी 
अशोक झा,सिलीगुड़ी: जन्माष्टमी को लेकर रक्षाबंधन जैसी स्थिति बनी हुई है। कुछ स्थानों पर 18 अगस्त को श्री कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी तो कुछ स्थानों पर 19 अगस्त को।
श्रीकृष्ण तो एक ही हैं लेकिन उनका जन्मोत्सव भारत के विभिन्न प्रान्तों और दुनिया के तमाम देशों में अलग अलग तरह से मनाया जाता है। इनमें तो बहुत से ऐसे आयोजन हैं जिनके बारे में हम जानते भी नहीं हैं। मिसाल के तौर पर 18 वीं सदी में मॉरिशस में ‘जहाजी भाइयों’ ने श्रीकृष्ण पूजन की शुरुआत की थी, बांग्लादेश में जन्माष्टमी पर छुट्टी रहती है और ढाका में जुलूस निकाले जाते हैं या फिर दुनिया भर में इस्कॉन के करीब डेढ़ हजार मंदिरों में सामान रूप से जन्माष्टमी के भव्य आयोजन होते हैं। दुनिया ही नहीं, भारत के कई हिस्सों में भगवान कृष्ण की जयंती अपने अनोखे अंदाज में मनाई जाती है। कृष्ण के आकर्षण के समान, उनके जन्मदिन के उत्सव में एक अनूठा उत्साह रहता है।

द्वारका 
कृष्ण के जन्मस्थान और उनके निकटस्थ हृदय स्थान वृंदावन के बाद कृष्ण की प्रिय नगरी द्वारका रही है क्योंकि यह वह स्थान है जहां भगवान कृष्ण ने अपने जीवन के लगभग पांच हजार वर्ष बिताए थे। किंवदंतियों के अनुसार, कृष्ण के स्वर्गलोक प्रस्थान के बाद अरब सागर में डूब गया था और माना जाता है कि सागर तल में वह नगरी आज भी मौजूद है। जन्माष्टमी के अवसर पर द्वारका के मंदिरों में बेहद उत्साह से पूजन अर्चन किया जाता है और हर साल बड़ी संख्या में भक्त भगवान कृष्ण की भक्ति में डूबने के लिए द्वारका आते हैं।

उड़ीसा 

ओडिशा में जगन्नाथ मंदिर भगवान कृष्ण का एक उत्कृष्ट मंदिर है, मान्यता है कि दाह संस्कार के पश्चात श्री कृष्ण का हृदय एक लट्ठे से बाँध कर समुद्र में विसर्जित किया गया था। पुरी में जगन्नाथ मंदिर का बहुत महत्व है क्योंकि किंवदंतियों का कहना है कि यह मंदिर वह जगह है जहाँ कृष्ण का हृदय पाया जा सकता है। जन्माष्टमी के अवसर पर ओडिशा के सभी प्रमुख मंदिरों को खूबसूरती से सजाया जाता है और भगवान कृष्ण को जन्म देते समय प्रसव पीड़ा को कम करने के लिए विशेष ‘जेड़ा भोग’ तैयार किया जाता है। यहां जन्माष्टमी उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है और प्रसिद्ध रथ यात्रा की तरह ही दिखाया जाता है।

गोवा 
ईसाइयों की एक बड़ी आबादी के साथ एक पुर्तगाली बस्ती होने के बावजूद, गोवा हिंदू धर्म का भी प्रमुख स्थान है। गोवा के मंदिर उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि चर्च। गोवा देवकी कृष्ण का भी घर है। ये वास्तव में भारत का एकमात्र मंदिर है जहां कृष्ण और देवकी की एक साथ पूजा की जाती है। इस मंदिर में जहां देवकी और छोटे कृष्ण की खड़ी स्थिति वाली मूर्ति की पूजा की जाती है। जन्माष्टमी पर इस मंदिर में बड़ी धूमधाम से पूजा की जाती है। पणजी से 17 किलोमीटर दूर मार्सेल में स्थित यह मंदिर गोवा में जन्माष्टमी का प्रमुख उत्सव केंद्र है।

जयपुर 
जयपुर में कृष्ण बलराम मंदिर और गोविंद देवजी मंदिर जन्माष्टमी समारोह के लिए प्रसिद्ध हैं। जयपुर शहर में कृष्ण बलराम मंदिर की तुलना वृंदावन स्थित कृष्ण बलराम मंदिर से की जाती है। सिटी पैलेस के अंदर स्थित प्रसिद्ध गोविंद देवजी मंदिर है, जहां कृष्ण की मुख्य छवि राजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा वृंदावन से लाई गई थी, जिसके बारे में माना जाता है कि कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने बनाया था।

मणिपुर 
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में जन्माष्टमी मनाने की संस्कृति का श्रेय 15वीं और 16वीं शताब्दी के शंकरदेव और चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं को जाता है। मणिपुर के लोग रासलीला का अभिनय करते हुए मणिपुरी नृत्य करते हैं। बोरगीत, भगवान कृष्ण की पूजा से प्रेरित नाटक अंकिया नाट तथा सत्त्रिया नृत्य ये सब इन क्षेत्रों में जन्माष्टमी परंपरा का एक हिस्सा हैं। मणिपुर के लगभग हर गाँव में कम से कम एक कृष्ण मंदिर है जहाँ जन्माष्टमी बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। मणिपुर की राजधानी इम्फाल में स्थित महाबली मंदिर और श्री गोविंदजी मंदिर काफी लोकप्रिय हैं।

कर्नाटक 
उडुपी के श्रीकृष्ण मठ मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी का भव्य आयोजन होता है। किंवदंतियों के अनुसार, इस मंदिर में स्थापित कृष्ण की मूर्ति की खोज संत माधवाचार्य ने 13 वीं शताब्दी में एक जहाज पर की थी और बाद में इसे पश्चिम की ओर मुख करके यहां रखा गया था। जन्माष्टमी के दौरान, यह आश्रम जैसा मंदिर सांस्कृतिक प्रदर्शन, रासलीला और कृष्ण के जीवन को दर्शाने वाले विभिन्न नाटकों से गुलजार रहता है। यहां की अनूठी विशेषताओं में से एक उत्कृष्ट नक्काशीदार खिड़की है जिसे नवग्रह किटिकी कहा जाता है जहां से भक्त भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं। इसके अलावा विट्टल पिंडी (रास लीला) और हुली वेशा (बाघ नृत्य) का आयोजन होता है। उडुपी में बड़े पैमाने पर जुलूस भी निकाले जाते हैं जिसमें रथ के नीचे गोपुरों को खड़ा किया जाता है। गोपुरों पर दही से भरे मिट्टी के बर्तन लटकाए जाते हैं जिन्हें जुलूस निकालने पर लाठियों से तोड़ा जाता है।

तमिलनाडु 
जन्माष्टमी पर लोग अपने घरों में भगवन कृष्ण के आगमन को चिह्नित करने के लिए प्रवेश द्वार पर एक बच्चे के छोटे पैरों के निशान बनाते हैं। दरवाजे पर पारंपरिक कोलम रंगोली पैटर्न बनाए जाते हैं। इस अवसर पर मीठे सीदाई, वेरकादलाई उरुंडई और दूध से बने व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाते हैं। इस दिन श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ एक लोकप्रिय प्रथा है।

केरल 
केरल में भगवन कृष्ण के जन्मोत्सव को ‘अष्टमी रोहिणी’ कहा जाता है। अष्टमी रोहिणी मलयाली महीने चिंगम यानी अगस्त-सितंबर में आती है। महिलाएं, विशेष रूप से नंबूथिरी समाज की, आधी रात तक जागती रहती हैं और भगवान की पूजा करती हैं। आमतौर पर, लड़कियां कैकोटिक्कली नृत्य करती हैं और गीत गाती हैं। कई लोगों के लिए, गुरुवायूर शहर में स्थित गुरुवायुर मंदिर और भुलोक वैकुंठ जाने की प्रथा है। भक्तगण भगवान् को अप्पम और पलपायसम (चावल और गुड़ से बनी खीर) अर्पित करते हैं। गुरुवायुर मंदिर को ‘पृथ्वी पर विष्णु का पवित्र निवास’ माना जाता है, और इसे ‘दक्षिण भारत का द्वारका’ भी कहा जाता है। इस मंदिर में विष्णु की मूर्ति देवकी और वासुदेव द्वारा देखे गए नवजात कृष्ण के रूप में है।

बंगाल 
जन्माष्टमी पर बंगाली परिवारों में श्रीकृष्णा अथवा नारायण की पूजा करने के लिए सुबह विशेष ‘कठमो पूजा’ की जाती है। कठमो पूजा में लकड़ी के फ्रेम पर मिट्टी की मूर्ति बनाई जाती है और पूजन किया जाता है। इसके बाद शाम को राधा कृष्ण की पूजा की जाती है। माखन, छाछ और घी के लिए भगवान कृष्ण के प्रेम को देखते हुए भोग तैयार कर भगवान को अर्पित किया जाता है। माखन मिश्री चीनी और माखन से भगवान कृष्ण की पसंदीदा मिष्टी दोई, शिन्नी और खोया मालपुआ भी तैयार किया जाता है।

गुजरात 
गुजरात में जन्माष्टमी में समान्य रूप से मंदिरों में सजावट और पूजन किया जाता है। एक ख़ास बात ये है कि इस दिन महिलाएं घर के सभी काम छोड़ कर ताश खेलती हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा है। जन्माष्टमी के दौरान इस अजीबोगरीब परंपरा का सटीक इतिहास अज्ञात है, लेकिन समाजशास्त्रियों के अनुसार, संयुक्त परिवार प्रणाली में महिलाओं द्वारा दिन भर उपवास रखने के बाद रात्रि जागरण में समय व्यतीत करने के लिए शायद ऐसा किया जाता है। ये महिलाएं दो दिन पहले बने ठन्डे भोजन को ग्रहण करती हैं।

बांग्लादेश में होता है ख़ास आयोजन 
जन्माष्टमी का त्यौहार बांग्लादेश में भी बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व पर बांग्लादेश में सार्वजानिक अवकाश रहता है तथा सबसे बड़ा आयोजन राजधानी ढाका में होता है। ढाका की जन्माष्टमी का प्रमुख आकर्षण जुलूस और झांकियां होती हैं। ये जुलूस कभी इतने प्रसिद्ध थे कि इन्हें देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। ऐसा माना जाता है कि जन्माष्टमी जुलूस 1555 में बंगशाल के एक साधु द्वारा शुरू किया गया था। तब इसे ‘श्री श्री राधाष्टमी’ कहा जाता था। पहला भव्य जन्माष्टमी जुलूस 1565 में निकाला गया था। जुलूस की जिम्मेदारी एक संपन्न व्यापारी कृष्णदास बसक के परिवार को दी गई थी। 1725 में, इस्लामपुर के दो व्यापारियों, गदाधर और बलई चंद बसाक ने एक और जुलूस का आयोजन किया। औपनिवेशिक काल के दौरान, हिंदू और मुसलमान दोनों जन्माष्टमी जुलूसों में भाग लेते थे और गीतों और नृत्यों के माध्यम से कृष्ण की जीवन-कथा प्रस्तुत करते थे। 1947 में भारत के विभाजन के बाद जन्माष्टमी के जुलूस में भी जमकर तोड़फोड़ हुई। नतीजतन, इन जुलूसों को बंद ही कर दिया गया। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद जन्माष्टमी जुलूसों को पुनर्जीवित किया गया था। वर्तमान में, जन्माष्टमी जुलूस हर साल ढाकेश्वरी मंदिर से निकाले जाते हैं। शहर के विभिन्न इलाकों में चक्कर लगाने के बाद जुलूस का समापन मंदिर में होता है। रिपोर्ट अशोक झा

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