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मुहर्रम आज, शहर में सुरक्षा के चाक-चौबंद व्यवस्था

मुहर्रम आज, शहर में सुरक्षा के चाक-चौबंद व्यवस्था
-ये इस्लाम धर्म का प्रमुख दिन माना जाता है, हजरत इमाम हुसैन, इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे
अशोक झा, सिलीगुड़ी इस साल मुहर्रम 31 जुलाई से शुरु हुआ है।।मुहर्रम का 10 वां दिन या 10वीं तारीख को यौम-ए-आशूरा के नाम से जाना जाता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मातम मनाते हैं। ये इस्लाम धर्म का प्रमुख दिन माना जाता है। हजरत इमाम हुसैन, इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे। कब है आशूरा और इस दिन का ऐतिहासिक महत्व क्या है आइए जानें।
आशूरा कब है
इस बार मुहर्रम की शुरुआत 31 जुलाई से हुई थी. इसलिए आशूरा 09 अगस्त यानी मंगलवार को है। इसके अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी आशूरा 09 अगस्त को ही है। कुछ अन्य देश जैसे सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कई अन्य देशों में मुहर्रम की शुरुआत 30 जुलाई से हुई थी। इसलिए वहां आशूरा 08 अगस्त को मनाया जाएगा।
वहीं मुहर्रम के महीने को ‘गम का महीना’ महा जाता है। इस्लामिक कैलेंडर ग्रेगोरियन कैलेंडर से करीब 11 दिन छोटा होता है और इसलिए इस्लामिक कैलेंडर में 365 नहीं, बल्कि 354 दिन होते हैं।
आज है मुहर्रम 2022
मुहर्रम का महीना शुरू होने के 10वें दिन आशूरा होता है और यह महीना 31 जुलाई को शुरू हुआ था। इस हिसाब से आज यान 9 अगस्त को आशूरा है जिसे मातम का दिन भी कहा जाता है। बता दें कि जिन देशों में मुहर्रम का महीना 30 जुलाई को शुरू हुआ था वहां 8 अगस्त को मुहर्रम मनाया गया। जबकि भारत समेत कई देशों मं यह 9 अगस्त को मनाया जा रहा है।
क्यों निकालते हैं ताज़िया
मुहर्रम के 10वें दिन मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग ताज़िया निकालते हैं। इसे हजरत इमाम हुसैन के मकबरे का प्रतीक माना जाता है और इस जुलूस में लोग शोक व्यक्त करते हैं। इस जुलूस में लोग अपनी छाती पीटकर इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं। 
मुहर्रम का इतिहास
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार पैंगबर मोहम्मद के पोते हजरत इमाम हुसैन को मुहर्रम के महीने में कर्बला की जंग में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। कर्बला की जंग हजरत इमाम हुसैन और बादशाह यजीद की सेना के बीच हुई थी। मान्यताओं के मुताबिक मुहर्रम के महीने में दसवें दिन ही इस्लाम की रक्षा के लिए हजरत इमाम हुसैन ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी। इसलिए मुहर्रम महीने के 10वें दिन मुहर्रम मनाया जाता है।

ऐतिहासिक महत्व
 हजरत इमाम हुसैन, इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे। उनकी शहादत मुहर्रम के 10वें दिन या फिर कहें की आशूरा के दिन हुई थी। हजरत इमाम हुसैन अपने इस्लाम की रक्षा के लिए 72 साथियों के सा​थ शहादत दे दी थी।
 इसमें उनका परिवार भी शामिल था।इस कुर्बानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। इतिहास में बताया गया है कि मुहर्रम के महीने की 10वीं तारीख को इमाम हुसैन और यजीद की सेना के बीच कर्बला की जंग हुई थी। कर्बला एक शहर है जो कि इराक में है।
निकाले जाते हैं ताजिया 
आशूरा के दिन इस्लाम के शिया समुदाय के लोग ताजिया निकालते हैं। ताजिया निकालकर मातम मनाया जाता है। जिस स्थान पर हजरत इमाम हुसैन का मकबरा बना है, उसी तरह का ताजिया बनाकर जुलूस निकाला जाता है। इस जुलूस में लोग मातम मनाते हैं। जुलूस में जो लोग शामिल होते हैं वो काले कपड़े पहनते हैं। मातम मनाते हुए लोग कहते हैं कि या हुसैन, हम न हुए। इसका अर्थ होता है कि हजरत इमाम हुसैन हम सब गमजदा हैं। कर्बला की जंग में हम आपके साथ नहीं थे, वरना हम भी इस्लाम की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी दे देते। रिपोर्ट अशोक झा

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