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अमरनाथ यात्रा मुस्लिम कनेक्शन तुष्टिकरण की एक सोची समझी साजिश

अमरनाथ यात्रा मुस्लिम कनेक्शन तुष्टिकरण की एक सोची समझी साजिश
-अमरनाथ गुफा की खोज 1850 में बूटा मलिक नाम के एक मुस्लिम चरवाहे ने की सच नहीं
– इसके पीछे अंग्रेजों की सोची समझी चाल अमरनाथ यात्रा दो साल बाद शुरू हुई लेकिन इस बार खराब मौसम ने श्रद्धालुओं को मायूस कर दिया है। गुफा के पास बादल फटने के बाद काफी तबाही हुई है। अमरनाथ यात्रा के बारे में जानना दिलचस्प है, आइए जानते हैं कि आखिर इस यात्रा का इतिहास क्या है और क्यों लोग अपनी जान की बाजी लगाकर गुफा के दर्शन करने पहुंचते हैं।हिमालय में सबसे ऊपर भगवान शिव के गुफा मंदिर की वार्षिक अमरनाथ यात्रा देश के सबसे प्रतिष्ठित तीर्थों में से एक है। हर साल हजारों की संख्या में तीर्थ यात्री मंदिर तक पहुंचते हैं। हालांकि, औपचारिक रूप से यात्रा कब शुरू हुई, इसका कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं है।
अमरनाथ गुफा का इतिहास
आस्था के तौर पर जो मशहूर है उसके मुताबिक जब भगवान शिव ने पार्वती को अपनी अमरता का रहस्य बताने का निर्णय किया, तो उन्होंने हिमालय में अमरनाथ गुफा को चुना। यह गुफा दक्षिण कश्मीर में पड़ती है। गुफा समुद्र तल से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर है, जहां सिर्फ पैदल या टट्टू के जरिए ही पहुंचा जा सकता है। गुफा तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक रास्ता पहलगाम की वादियों से जाता है तो दूसरा रास्ता बालटाल से जाता है। तीर्थ यात्री पहलगाम से 46 किमी या बालटाल से 16 किमी की दूरी पर घुमावदार पहाड़ी रास्ते से यात्रा करते हैं।
अमरनाथ का मुस्लिम कनेक्शन एक सोची समझी साजिश
भारत में एक कहावत है कि किसी झूठ को इतनी बार बोलो कि एक दिन वो लोगों को सच लगने लगे। ऐसे ही झूठ भारत में अमरनाथ यात्रा पर सदियों से बताया जा रहा है। कश्मीर की वादियों में एक लोककथा गूंजती है। जिससे पता चलता है कि अमरनाथ गुफा का मुस्लिम कनेक्शन भी है। घाटी में बचे कश्मीरी पंडित भी इस कहानी को सही बताते हैं।ऐसे दुर्गम रास्तों की वजह से अमरनाथ यात्रा आसान नहीं है। लोककथा के अनुसार, अमरनाथ गुफा की खोज 1850 में बूटा मलिक नाम के एक मुस्लिम चरवाहे ने की थी। मलिक अपने जानवरों के झुंड के साथ पहाड़ में बहुत ऊंचाई तक चले गए। एक संत ने बूटा मलिक को कोयले का एक थैला दिया। घर लौटने के बाद, मलिक ने बैग खोला, और उसमें गोल्ड भरा हुआ था। खुशी से पागल बूटा मलिक उस जगह तक दौड़ते हुए उस संत का शुक्रिया अदा करने पहुंचे लेकिन उस संत का दूर दूर तक पता नहीं था। इसके बजाय उन्होंने वहां एक वह गुफा पाई और उसमें बर्फ से बना लिंगम था। बूटा मलिक हिन्दू धर्म से परिचित थे और प्रतीक चिह्न का मतलब बखूबी जानते थे।बर्फ का यह लिंग भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी पूजा होती है। बर्फ का लिंग, गुफा की छत में एक जगह से पानी के लगातार टपकते रहने से बनता है। यही पानी जमता जाता है। फिर यह लिंग का आकार लेता है। शिव लिंगम को हर साल मई में अपना पूर्ण आकार मिलता है, जिसके बाद यह पिघलना शुरू हो जाता है। अगस्त तक यह पिघल जाता है।शिव लिंगम के बाईं ओर दो छोटे बर्फ के डंठल हैं, जो पार्वती और भगवान गणेश का प्रतिनिधित्व करते हैं।अब कहां है बूटा मलिक का परिवार
बूटा मलिक और उनके परिवार ने इस पवित्र गुफा के बारे में अपने जानने वाले कश्मीरी पंडितों को बताना शुरू किया। इस मुस्लिम परिवार ने ही गुफा के देखरेख की जिम्मेदारी संभाल ली। धीरे-धीरे कश्मीरी पंडितों का जत्था यहां आने लगा। फिर दशनामी अखाड़े और पुरोहित सभा मट्टन के पुजारी भी समय के साथ इसके गुफा के संरक्षक बन गए। आस्थाओं के इस अनूठे ग्रुप ने अमरनाथ को कश्मीर की सदियों पुरानी सांप्रदायिक सद्भाव और मिलीजुली संस्कृति के प्रतीक में बदल दिया। 2000 में, मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की सरकार ने कहा कि अमरनाथ यात्रा में सुविधाओं और सुधार की जरूरत है। हमारी सरकार इसमें कुछ बदलाव लाएगी। उन्होंने श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड बनाने का ऐलान किया। इसके बाद राज्यपाल की अध्यक्षता में यह बोर्ड गठित हुआ।
सदियों से बताया जा रहा सबसे बड़ा झूठ
भारत की पीढ़ियों को सदियों से बताया जा रहा है कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुस्लिम गड़रिए बूटा मलिक ने साल 1850 में की थी। जिसमें उसे भगवान शिवा का हिमलिंग अवतार मिला था और इस गड़रिए की खोज के बाद ही बाबा बर्फानी के बारे में पूरे देश के लोगों को पता चला और तीर्थ यात्री अमरनाथ यात्रा करने लगे। भारत की आम जनता भी इस गड़रिए वाली कहानी को सच मानती है।लेकिन आज हम आपको तथ्यों के साथ असल इतिहास बताते हैं कि कैसे सदियों से भारतियों से झूठ बोला रहा है।
इस सच से अंजान हैं आप?

अमरनाथ यात्रा और भगवान शिव के हिमलिंग के साक्ष्य 5 शताब्दी में लिखी गई पुराणों से लेकर, 12वीं शताब्दी में कश्मीर पर लिखे गए ग्रन्थ राजतरंगणि, 16वीं शताब्दी में अकबर के शासन पर लिखी गई आइन ए अकबरी, 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के फ्रेंच डॉक्टर फ्रैंकोइस बेरनर की किताब और 1842 में ब्रिटिश यात्री GT vegne की किताब में मिलते हैं। इन किताबों में अमरनाथ यात्रा से लेकर भगवान शिव के हिमलिंग का विस्तृत वर्णन किया गया है, जो साबित करती है कि अमरनाथ धाम में बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए की जाने वाली यात्रा 1850 में गड़रिए की खोज के बाद नहीं बल्कि उससे कई हजारों वर्ष पहले से हो रही है।पांचवी शताब्दी में लिखे गए लिंग पुराण के 12वें अध्याय के 487 नंबर पेज पर लिखे 151 वें श्लोक में लिखा है।मध्यमेश्वरमित्युक्तं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
अमरेश्वरं च वरदं देवैः पूर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
इस श्लोक में लिखे अमरेश्वर का अर्थ है, अमरनाथ में विराजमान बाबा बर्फानी जिन्हें अमरेश्वर नाम से भी जाना जाता है.12 वीं शताब्दी मे कश्मीर के प्राचीन इतिहासकार कलहड़ द्वारा रचित ग्रन्थ राजतरंगिणी के 280 पेज पर 267वां श्लोक है।
दुग्धाव्धिधवलं तेन सरो दूरगिरी कृतम्। 
अमरेश्वरयात्रायां जनरद्यापि दृश्यते ।।
ग्रंथों में पहले से है जिक्र

इस श्लोक का अर्थ है उसने दूर पर्वत पर दुग्ध सागर तुल्य धवल एक सर का निर्माण कराया। अमरेश्वर यात्रा में जनता उसे आज भी देखती है। इस श्लोक में अमरनाथ यात्रा का जिक्र किया जा रहा है। यानी सोचिए जिन बाबा बर्फानी के 1850 में खोजे जाने का दावा किया जाता है और बताया जाता है कि 1850 के बाद से ही अमरनाथ की यात्रा शुरू हुई उस अमरनाथ यात्रा का जिक्र 12वीं शताब्दी में लिखे ग्रंथो में हो रहा है।आइन-ए-अकबर में भी है इस बात का उल्लेख

16वीं शताब्दी में अकबर के शासनकाल पर लिखी गई आइन ए अकबरी में अमरनाथ यात्रा और बर्फ के शिवलिंग का उल्लेख है। आइन ए अकबरी के दूसरे खण्ड के पेज नंबर 360 पर स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि एक गुफा में बर्फ की आकृति है जिसे अमरनाथ कहा जाता है। यह पवित्र स्थान है और पूर्णिमा के समय बूंद से धीमे-धीमे 15 दिनों में बर्फ की आकृति बनती है जिसे श्रद्धालु महादेव की आकृति मानते हैं और अमावस के बाद यह धीमे-धीमे पिघलने लगती है। अमरनाथ यात्रा और बाबा बर्फानी का जिक्र आइन ए अकबरी में बूटा मलिक वाली फर्जी खोज से 300 वर्ष पहले हो रहा है।डिजाइनर इतिहासकार अब इन तथ्यों को क्या कहेंगे? 

17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासन काल में उसके फ्रेंच डॉक्टर फ्रैंकोइस बेरनर की किताब Travels in the Mogul Empire के 418 पेज पर अमरनाथ यात्रा, भगवान शिव के हिमलिंग और हिन्दू मान्यताओं का जिक्र है। हो सकता इतने सबूत भी देश के डिजाइनर इतिहासकारों को पूरे ना पड़ रहे हों, तो आइए अब अंग्रेज यात्री और इतिहासकार GT VEGNE ने (वेगने) वर्ष 1835 से 1838 तक कश्मीर की यात्रा की थी और बूटा मलिक की फर्जी मनगढ़ंत खोज से 8 वर्ष पहले 1842 में इस यात्रा पर Travels in Kashmir, Ladak, Iskardo, the Countries Adjoining the Mountain-course of the Indus, the Himalaya, North of the Punjab नाम की किताब छापी थी। इस किताब के 2 volumes हैं और दोनों में अमरनाथ और अमरनाथ यात्रा का जिक्र है।

सावन महीने में यात्रा का जिक्र

किताब के पहले संस्करण के पेज 148 में पहलगाम और अमरनाथ का जिक्र है जबकि किताब के दूसरे संस्करण के पेज 7 और 8 पर GT WEGNE अमरनाथ धाम पर पहलगाम के रास्ते पहुंचने का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि हिन्दू सावन महीने के 15वें दिन अमरनाथ की गुफा में पूजा पाठ हो रही है और इस पूजा में भारत के कोने-कोने से श्रद्धालु आ रहे हैं। 

किसी मुस्लिम ने नहीं की अमरनाथ की खोज

भारत में इतिहास पर शोध करने वाली सबसे बड़ी संस्था भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के निदेशक डॉ ओम जी उपाध्याय के मुताबिक पांचवी शताब्दी से लेकर वर्ष 1842 तक के सभी ऐतिहासिक ग्रंथों में, रचनाओं में, लेखन में अमरनाथ यात्रा और बाबा बर्फानी के भव्य स्वरूप का वर्णन मिलता है। लेकिन वर्ष 1900 के बाद एकदम से भारत की पीढ़ी को बताया जाता है कि बाबा बर्फानी की खोज तो एक मुस्लिम गड़रिए ने की थी। यह फेक नैरेटिव इतिहासकारों ने और अंग्रेजों ने इस लिए फैलाया ताकि भारत के हिन्दू को कभी उसकी गौरवमयी परम्परा का पता ही ना लगे और उसे लगे कि उसके धर्म की खोज भी मुसलमानों और अंग्रेजों ने की है।

क्या है अमरनाथ का असली महत्व?

जेएनयू में इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ हीरामन तिवारी के मुताबिक प्राचीन ग्रंथों में बताया जाता है कि जब भगवान शिव का खुद के अमर होने का असल कारण देवी पार्वती को बताना होता है तो वो अमरनाथ की गुफा में ही जाकर इसे देवी पार्वती को बताते हैं। यह सैकड़ों वर्षो से हिन्दू मान्यतों में मौजूद है लेकिन बूटा मलिक को लाकर भारत की पीढ़ी के दिमाग में भर दिया जाता है कि हिन्दुओं को बूटा मलिक का अहसान मानना चाहिए जिसने बाबा बर्फानी को खोजा था।

क्या हिंदुओं को मानना चाहिए कश्मीरी मुस्लिमों का अहसान?

राजनैतिक एवं सामाजिक विश्लेषक नीरज सक्सेना की मानें तो बूटा मलिक की कहानी पीढ़ियों के दिमाग में भरना उस तुष्टिकरण का हिस्सा है जो आज भारत में राजनैतिक पार्टियां कर रही हैं, इसका सीधा सा मतलब है बूटा मलिक के सहारे हिंदुओं को बताना कि उन्हें कश्मीरी मुसलमानों का अहसान मानना चाहिए। वर्ष 1850 में फर्जी रूप से बाबा बर्फानी को खोजने के दावे के बाद साल 2000 तक बूटा मलिक के वंशज इस अमरनाथ गुफा की रखवाली करते थे और यहां आने वाले श्रद्धालुओं के चढ़ावे का एक तिहाई हिस्सा बूटा मलिक के वंशजो को मिलता था। लेकिन वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा अमरनाथ श्राइन बोर्ड का गठन किया और तब जाकर अमरनाथ में बाबा बर्फानी की फर्जी खोज करने वाले वंशजों को अमरनाथ गुफा से भी अलग किया गया और इन्हें मिलने वाला दान का एक तिहाई हिस्सा मिलना भी खत्म हुआ। कहते हैं वर्ष 1526 से 1857 के बीच जब भारत पर मुगलों का राज था, उस समय ये इतिहास मुगलों के दरबारी इतिहासकारों द्वारा लिखा गया।इसमें मुगल शासकों को भारत के नायक के तौर पर पेश किया गया।

अकबर को इतिहास में महान बताया गया

अकबर को Akbar The Great कहा गया. मुगलों ने हिन्दुओं पर जो अत्याचार किए और जो सैकड़ों मन्दिर तोड़ कर मस्जिदें बनाई गईं, उनकी वास्तविकता को भी मुगलों ने अपने हिसाब से इतिहास में लिखा। इसी तरह मुगलों के बाद जब अंग्रेज़ भारत आए, तब उन्होंने भी भारत के इतिहास को अपने हिसाब से बदलने की कोशिश की। अंग्रेज़ों ने भारत का जो इतिहास लिखा, उसमें भारत की सांस्कृतिक पहचान, उसके मौलिक व्यवहार और उसकी वास्तविकता को हमेशा लोगों से छिपाया गया।15 अगस्त 1947 को जब भारत आज़ाद हुआ, तब भी हमारे देश में इतिहास की रुपरेखा नहीं बदली। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आजादी के बाद भारत पर ऐसे नेताओं ने शासन किया, जो अंग्रेजों की बी-टीम का हिस्सा थे। यानी हमारे देश का इतिहास मुगल शासकों और ब्रिटिश राज के पन्नों से भरा पड़ा है। स्कूलों में बच्चों को औरंगज़ेब और बाबर के बारे में पढ़ाया जाता है और इतिहास की एक ऐसी रुपरेखा खींची जाती है, जिसमें सच कहीं पीछे छूट जाता है।

वामपंथी इतिहासकारों ने बदल दी हिस्ट्री

आज भी हमारे देश के लोगों को अमरनाथ गुफा का वही सच पता है, जिसका दशकों तक हमारे देश के इतिहासकारों ने प्रचार प्रसार किया। सरल शब्दों में कहें तो अमरनाथ गुफा के सच के साथ हमारे देश में ऐसी सोशल इंजीनियरिंग हुई, जिसके तहत ये बताया गया कि हिन्दू श्रद्धालुओं को उस मुस्लिम गडरिए का अहसान मानना चाहिए, जिसने अमरनाथ गुफा की खोज की थी। जबकि सच ये है कि अमरनाथ गुफा की वास्तविकता, इसका इतिहास, इसका वैभव और इसकी पहचान सदियों पुरानी है। रिपोर्ट अशोक झा

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