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मधुश्रावणी  और सावन की पहली सोमवारी आज  मिथिला का पारंपरिक, धार्मिक पर्व मधुश्रावणी का विशेष महत्व

मधुश्रावणी  और सावन की पहली सोमवारी आज 
मिथिला का पारंपरिक, धार्मिक पर्व मधुश्रावणी का विशेष महत्व
अशोक  झा,सिलीगुड़ी:  सिलिगुड़ी सोमवार को होनेवाली मधुश्रावणी की पहली पूजा, पहली सोमवारी सहित बिषहरा गह्वरों में पंचमी पूजन आज  है। सावन कृष्ण पक्ष के पंचमी से शुरू होनेवाले नवविवाहितों का मधुश्रावणी पर्व को लेकर तैयारियां लगभग सभी घरों में पूरा हो गया है। इसके अतिरिक्त सावन की पहली सोमवारी की तैयारी विभिन्न शिवालयों एवं पंचमी को लेकर बिषहरा गह्वरों में कर ली गयी है। मिथिला का पारंपरिक, धार्मिक पर्व मधुश्रावणी मुख्य रूप से मैथिल ब्राह्मण एवं कायस्थ परिवारों में मनाया जाता है। अपने सुहाग की रक्षा के लिए करीब 15 दिनों तक होने वाली पूजा के दौरान नवविवाहिता पूरे नियम निष्ठा का पालन करती है। रविवार को नहाय खाय, गौर निर्माण एवं पूजा घर की तैयारी में नवव्याहतायें तथा परिजन व्यस्त हो गये हैं। 18 जुलाई सोमवार को प्रथम पूजा के साथ शुरू होने वाला मधुश्रावणी 31 जुलाई को नवब्याहता के अग्निपरीक्षा के साथ खत्म होगा। पूजा के प्रथम दिन पूजा व्रतियों के ससुराल से पूजन सामग्री, वस्त्र सहित पूजा के दौरान अरवा भोजन का सामान भेजा जाता है। पूजा के अंतिम दिन नवब्याहता के पूजन सामग्री, वस्त्र के साथ कथकहनी व परिवार के छोटे बड़े सभी सदस्यों का वस्त्र सहित सुहागिनों के भोज की सामग्री ससुराल पक्ष से आने की प्रथा है, जिसका आज भी निर्वहन किया जा रहा है। पूजा के दौरान कथकहनी प्रत्येक दिन शिव पार्वती से जुड़ी कहानियां सुनाती है। पूजन देखने और मधुश्रावणी कथा सुनने आनेवाली आस पड़ोस की महिला मण्डली द्वारा पूजा के दौरान भगवती, विषहरा एवं शिव नचारी का लोकगीत गाया जाता है। पूजा के दौरान नवब्याहताओं की टोलियां शाम को अपनी सहेलियों के साथ गांव के फुलवारियों से फूल पत्ते तोड़कर लाती है और सुबह में उन फूलों सहित अन्य पूजन सामग्रियों से गौरी व नाग नागिन की पूजा करती है। त्योहार के अंतिम दिन ससुराल से आये रुई के बाती ( टेमी ) को जलाकर नवविवाहितों को दागने की प्रथा है। टेमी के नाम से प्रचलित यह रस्म नवब्याहता की अग्निपरीक्षा के समान है। नव विवाहिता पति के दीर्घायु के लिए मधुश्रावणी पूजन करती है। पूजन के दौरान मैना पंचमी, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, पतिव्रता, महादेव कथा, गौरी तपस्या, शिव विवाह, गंगा कथा, बिहुला कथा तथा बाल वसंत कथा सहित 14 खंडों में कथा का श्रवण किया जाता है। गांव समाज की बुजुर्ग महिला कथा वाचिका होती हैं। प्रतिदिन संध्याकाल में महिलाएं आरती, सुहाग गीत तथा कोहवर गाकर भगवान भोले शंकर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करती हैं। पूरे पूजा के दौरान आस्था व श्रद्धा के साथ विषहारा की पूजा अर्चना की जाती है व गीत गाए जाते हैं। त्योहार को लेकर नवब्याहताओं में खास उत्साह देखा जा रहा है। दूसरी ओर सावन की इस प्रथम सोमवारी एवं मैना पंचमी को लेकर प्रखण्ड के विभिन्न विषहरा गह्वरों में भी विशेष पूजा की तैयारी की जा रही है। रिपोर्ट अशोक झा

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