Khabar AajkalNewsPoliticsPopular

मुस्लिम समाज खोज रहे अपनी मजबूत जड़े

मुस्लिम समाज खोज रहे अपनी मजबूत जड़े
-मुसलमान और गैर मुसलमान के बीच संबंध स्थापित करने में स्थानीयता एक बड़ी भूमिका निभाता
अशोक झा, सिलीगुड़ी: संजय वोहरा की पैदाइश दिल्ली की है लेकिन उनका मूल पाकिस्तान बन चुके पेशावर से है। उनका परिवार विभाजन के समय भारत आया था। उन्होंने विभाजन को नहीं देखा लेकिन उनके परिवार में आज भी विभाजन की दर्दनाक कहानियां सुनी व सुनाई जाती हैं। वो बताते हैं कि वोहरा परिवार पेशावर भी कंधार के इलाके से उजड़कर आया था। जैसे जैसे इलाके इस्लाम के आगोश में आते गए मतांतरण से विमुख लोगों को पलायन की पीड़ा झेलनी पड़ी। इस पलायन से वही बच पाये जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया। संजय वोहरा बताते हैं कि कंधार आदि इलाकों में आज भी वोहरा सरनेम रखने वाले मुसलमान मिल जाते हैं। संजय वोहरा बताते हैं कि हाल में ही वो कश्मीर गये तो पुलवामा के एक गांव में पांच दिन रुके। उनके रंगरूप की वजह से ग्रामीण कश्मीरी उनको अपना मान बैठे और जमकर प्यार व सम्मान उड़ेला। संजय पंजाबी परंपरा के मुताबिक हाथ में कड़ा पहनते हैं। इस वजह से किसी ग्रामीण ने मेजबान को इशारे में याद दिलाई कि वह गैर इस्लामिक हैं। लेकिन इतने भर से उनको मिले प्यार और अपनेपन में ज्यादा अंतर नहीं आया। संजय वोहरा की इस बात से इतना तो साबित होता है कि स्थानीय पहचान को इस्लाम अपनी तेज धार वाले चाकू से काट नहीं पाया है। मुसलमान और गैर मुसलमान के बीच संबंध स्थापित करने में स्थानीयता एक बड़ी भूमिका निभाता है। यह यूनिवर्सल भाईचारा भले न हो लेकिन लोकल भाईचारे का पर्याप्त आधार बन जाता है। लेकिन यहां एक बात और समझनेवाली है। स्थानीय मुसलमानों की यह जातीय पहचान जहां गैर-मुस्लिमों से मेल जोल का जरिया बनती है वहीं मुसलमानों में भेदभाव का कारण बन जाती है। पशमांदा मुसलमानों पर लंबे समय से काम कर रहे यूसुफ अंसारी मानते हैं कि अल्पसंख्यक के नाम पर अगड़ी जाति (अफ़रोज़) के चंद मुसलमानों ने चालाकी से उन बहुसंख्यक मुसलमानों पर राज किया है जो भारतीय मूल के हैं। अशराफिया तबके या उच्च जाति के मुसलमानों से अलग पसमांदा मुसलमान मानते हैं कि उनके पूर्वज बाहरी नहीं बल्कि यहीं के थे। किसी न किसी दौर में किसी न किसी वजह से इस्लाम धर्म कबूल कर लिया। ताजुब्ब की बात तो यह है कि मुसलमानों के बीच “भाईचारा और समानता” की बात करने वाले इस्लाम में भी इस्लाम कबूलने वाले भारतीयों को बराबर का हक नहीं मिला। उनको सैकड़ों वर्षों के बाद भी तौहीनी नजर से देखा जाता है। अफ़रोज़ मुसलमान पसमांदा के साथ रोटी बेटी का रिश्ता नहीं रखते। अफ़रोज़ अपनी जड़ भारत के बाहर ढूंढते हैं, तो पसमांदा खुद को स्थानिक मानते हैं। जहां तक सामाजिक रिश्ते की बात है तो पश्चिम उत्तर प्रदेश और हरियाणा में बहुतेरे मुसलमान हैं, जो खुद को आज भी राजपूत, गुर्जर या जाट आदि खापों से अपने आपको जोड़े हुए हैं। हरियाणा के नूह से लेकर गाजियाबाद, मेरठ तक मेवाती मुसलमानों की बड़ी आबादी है। पाकिस्तान स्थित एक फेसबुक परिचित का सरनेम मेवाती है। ट्रांसपोर्ट का बड़ा कारोबार है। सियासत में भी रसूख है। परिवार से सभासद और मंत्री हैं। बात करने पर उन्होंने खुद की जड़ गाजियाबाद के मेवाती परिवार से जुड़ी बताई और कहा कि उनका आपसी रिश्ता आज भी बहाल है। उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा चुनाव में कैराना से भारतीय जनता पार्टी का चेहरा और उम्मीदवार बनी मृगांका सिंह के बारे में यह तथ्य छनकर बाहर आया था कि वो समाजवादी पार्टी के विधायक नावेद हसन की चचिया बहन हैं। 120 साल पहले परिवार का एक भाई यानी नावेद के पूर्वजों ने किन्ही वजहों से इस्लाम कबूल लिया। नावेद हसन सरीखे बहुतेरे मुसलमान हैं जिन्होंने अपनी जड़ तलाश ली है और बताने लगे हैं कि वह फलां फलां परिवार से संबंध रखते हैं। हाल के दिनो में लाउडस्पीकर पर होने वाली अजान की आवाज को लेकर कोई न कोई विवाद होता रहता है। विवाद करने वालों को शायद ही पता हो कि यह विवाद मुस्लिम बनाम मुस्लिम में भी हो सकता है जिसका कारण स्थानीय पहचान से जुड़ा है। कोलकाता की गालियों में अलग अलग मस्जिदों से गूंजने वाली अज़ान की आवाज़ और धुन अलग अलग हुआ करती हैं। ऊर्दू तलफ्फुज वालों की मस्जिद से निकलने वाली अज़ान बंगाली मुसलमानों की नजर में अशुद्ध है। उर्दू की अशुद्ध अज़ान सुनकर मस्जिद में आने वाले बिहारी मुसलमानों के प्रति कोलकाता ही नहीं ढाका में भी घनघोर असम्मान का भाव देखा जाता है। फिलहाल इन्हीं बांग्लादेशी बंगाली मुसलमानों को लेकर असम में वितंडा मचा है। वहां बंगाली और असमी बोलने वाले दो अलग किस्म के मुसलमान हैं। असम में निरंतर होनेवाली घुसपैठ के कारण बंगाली मुसलमान असमी बोलने वालों से ज्यादा हो गए। असमी मुसलमान अस्मिता को लेकर परेशान हैं। इसे देखकर अभी बीते हफ्ते मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा की कैबिनेट ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। असम कैबिनेट ने पांच मुस्लिम समुदायों को असमी मूल का होने की संज्ञा दी है। इनमें गौरिया, मोरिया, जुल्हा, देशी और सैयद मुसलमान हैं। गौरिया मुसलमान का इतिहास यह है कि सन 1615 और 1682 ईस्वी में मुगलों ने चढ़ाई की। बंगाल के गौर मूल के कई सैनिकों को कैद कर इस्लाम धर्म अपनाने को मजबूर किया। ये असम आकर स्थानीय महिलाओं संग शादी ब्याह रचा कर बस गए और गौरिया मुसलमान कहलाए। इसी तरह ब्रिटिश इतिहासकार एडवर्ड गेट ने “ए हिस्ट्री ऑफ असम” में लिखा है कि 16वीं सदी में हमलावर तुरबक खान ने तांबे का काम करने वालों को इस्लाम मानने को मजबूर किया। वही अब मोरिया मुसलमान हैं। असमी बोलने वाले मोरियाओं ने अपनी पहचान बचा रखी है। जुल्हा मुसलमान संख्या में कम हैं। ये बुनकर समाज से हैं। 19वीं सदी में चाय बागानों में मजदूरी के लिए आए। इनमें अविभाजित बंगाल के दिनों में बिहार, ओडिशा और पश्चिमी बंगाल से इस्लाम अपनाने वाले आदिवासी भी शामिल हैं। असम कैबिनेट ने जिन देशी मूल मुसलमानों को स्थानीय माना है उनका दावा है कि वह इस्लाम कबूलने वाले असमियों में सबसे पुराने हैं। वह अली मेंच के वंशज हैं जो कोच राजवंशी शासक थे। सन 1205 ईस्वी में बख़्तियार खिलजी के दिनों में आक्रांता से बचने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया था। इसी तरह असम में स्थानीय मूल का दर्जा पाने वालों में असमिया बोलने वाले सैयद मुसलमान हैं। ये सूफी परंपरा से आते हैं। ये मदन पीर के उपासक हैं। सन 1497 में सैयद बदीउदीन शाह मदा और 1630 के आसपास अज़ान फकीर मोइनुद्दीन बगदादी आज़म पीर के सहारे यहां इस्लाम लेकर आए। इन पांच के अलावा और भी मुस्लिम समुदाय हैं,जो खुद को असमी मूल का कहलाना चाहते हैं। इनमें बराक घाटी के कचारी मुसलमान शामिल हैं। बराक घाटी के स्थानीय मुस्लिम समाज के नेता अतिकुर रहमान बरभुइयां बताते हैं कि उनके समाज का इतिहास 16वीं सदी का है। वह 13 से 19 वीं सदी तक राज करने वाले कचारी राजवंश का हिस्सा रहे। बराक घाटी के अधिसंख्य बंगाली बोलने वाले हिंदू और मुस्लिमों से उनकी पहचान अलग है। उनके समुदाय को भी असमी मुस्लिम का दर्जा मिलना चाहिए। मुसलमानों का अशराफिया तबका भले ही विदेशी मूल की अपनी पहचान पर गर्व करता हो लेकिन जिन्हें पसमांदा मुसलमान कहा जाता है वो अपनी जाति और स्थानीय पहचान से ज्यादा जुड़े हुए हैं। इस्लाम में कन्वर्ट होने के बाद भी उनका यह जुड़ाव कमजोर नहीं हुआ है। अब उत्तर भारत में यही पसमांदा मुसलमान गोलबंद हो रहे हैं और अशराफिया तबके को चुनौती भी दे रहे हैं जो विदेशी मूल होने को अपनी श्रेष्ठता बताता है। रिपोर्ट अशोक झा

Related Articles

Back to top button