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14 जुलाई से सावन का महीना शुरू -शिवभक्तों के लिए 2 साल बाद खुशी की बात

14 जुलाई से सावन का महीना शुरू
-शिवभक्तों के लिए 2 साल बाद खुशी की बात, कर सकेंगे कांवड़ यात्रा
 अशोक झा, सिलीगुड़ी:  शिवभक्तों के लिए 2 साल बाद खुशी की बात है…पिछले 2 साल से कोरोना संक्रमण के चलते प्रतिबंधित हुई कांवड़ यात्रा में शिवभक्तों को पूरी छूट दी जाएगी…कांवड़ यात्रा के चलते तैयारियां भी पूरे जोश-शोर से की जा रही है …सावन शिवभक्तों के लिए खास होता है। सावन का महीना भगवान शिव और उनके भक्‍त दोनों के लिए बेहद खास होता है। कहते हैं कि शिवजी को श्रावण मास बेहद प्रिय है। श्रावण मास में शिवपूजन का महत्‍व और बढ़ जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि सावन के महीने में शिवजी के 12 ज्‍योतिर्लिंगों में से किसी एक पर जाकर रुद्राभिषेक करने से भोलेबाबा बहुत प्रसन्‍न होते हैं और भक्‍तों की सभी इच्‍छाएं पूर्ण करते हैं।
सावन का महीना पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित होता है और इस दौरान जो भक्त पूरे श्रद्धा भाव से पूजा एवं जल और दूध का अभिषेक करता है उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। इस साल सावन का पवित्र महीना 14 जुलाई से आरंभ हो रहा है और 12 अगस्त तक रहेगा। साल 2022 में सावन 14 जुलाई से शुरू होगा और 12 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा के साथ खत्म होगा। हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि होती है, लेकिन सावन में पड़ने वाली शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन शिवरात्रि के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें। सावन में शिवरात्रि की पूजा मंदिर या घर में भी की जा सकती है. इस दिन शिवलिंग का रुद्राभिषेक करना चाहिए। गंगाजल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गन्ने का रस आदि से भगवान शंकर का रुद्राभिषेक करें। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर रोली, मोली, पुष्म, सफेद चंदन, बेलपत्र, धतूरा और श्रीफल, कपूर, फल आदि अर्पित करें। धूप, दीप, फल और फूल चढ़ाकर भोलेभंडारी का ध्यान करें. शिव की पूजा के दौरान शिव चालीसा, शिव स्तुति, शिव अष्टक, शिव का पंचाक्षरी मंत्र का जाप करते रहें। शिवरात्रि की कथा सुने और परिवार सहित भोले बाबा की आरती करें।शास्त्रों के अनुसार, सावन मास में कुछ बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए। सावन महीने में कुछ गलतियों को करने से बचना चाहिए।शास्त्रों के अनुसार, श्रावण मास की उत्पति श्रवण नक्षत्र से हुई है। श्रवण नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा को माना गया है और चंद्रमा शिवशंकर के माथे पर विराजमान है। श्रवण नक्षत्र को जलतत्व का कारक माना गया है। जल शिवशंकर को अत्यंत प्रिय है। चूंकि धरती पर अवतरित होने से पहले गंगा मैया भोले बाबा की जटाओं में समाई थीं। इसीलिए मान्यता है कि इस महीने हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर शिवालयों में जलाभिषेक करने से शिवशंकर अति प्रसन्न होते हैं और भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है।
ये भी है एक कथा: शिवपुराण में उल्लेख है कि एक बार भगवान शिव और पार्वती हरिद्वार में गंगा के तट पर भक्तों की परीक्षा लेने के मकसद से बैठे। पार्वती ने सुंदर स्त्री का रूप धारण किया था, जबकि भगवान शिव ने कोढ़ी का। पार्वती के मोहनी रूप पर मुग्ध होकर वहां से गुजरने वाले लोगों ने उनसे पूछा कि आप इस कोढ़ी के साथ क्यों हैं? साथ छोड़ क्यों नहीं देतीं? पार्वती ने उत्तर दिया कि मैं एक ऐसे व्यक्ति की तलाश में हूं, जिसमें एक हजार अश्वमेघ यज्ञ करने की शक्ति हो। वह यदि मेरे पति को छू देंगे, तो इनकी बीमारी ठीक हो जाएगी। यहां इसलिए बैठी हूं कि जिस किसी शख्स में एक हजार अश्वमेध यज्ञ करने की शक्ति हो और वह मेरे पति को स्पर्श कर देगा तो उनका कोढ़ ठीक हो जाएगा।पार्वती के प्रश्न से लोग निरुत्तर होकर आगे बढ़ते रहे। तभी शिव वेषधारी एक ब्राह्मण ने यह बात सुनी, तो उसने तुरंत ही कोढ़ी के रूप में पार्वती के साथ विराजमान शिव को स्पर्श कर लिया। उनका कोढ़ ठीक हो गया। पार्वती ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि आपने इतने अश्र्वमेध यज्ञ कैसे किए, ब्राह्मण ने जवाब दिया कि मैं कई वर्षों से श्रावण मास में हरिद्वार स्थित गंगा के तट से गंगाजल लेकर शिवरात्रि पर शिव का जलाभिषेक करता आ रहा हूं। गंगाजल से शिव जलाभिषेक करने की कामना के साथ एक कदम हरिद्वार गंगा तट की ओर बढ़ाने से 1000 अश्र्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है, इसीलिए मैं कई वर्षों से हरिद्वार आ रहा हूं। मुझे मालूम है कि मुझे इसका पुण्य अवश्य मिलता होगा। इसीलिए मैंने आपके पति को स्पर्श किया और उनका कोढ़ ठीक हो गया। ब्राह्मण की बात सुन शिव और पार्वती ने उन्हें साक्षात् दर्शन और आशीर्वाद दिया। मान्यता यह भी है कि तभी से श्रावण मास में हरिद्वार से गंगाजल लेकर बाबा का जलाभिषेक करने को कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।आशुतोष की पार्थिव पूजा: श्रावण महीने में पार्थिव शिव पूजा, यानी पवित्र मिट्टी से शिवलिंग स्थापित कर विधिवत पूजन का विशेष महत्व है। इसलिए हर दिन या सोमवार को शिव पूजा या पार्थिव शिव पूजा अवश्य करनी चाहिए।सावन के महीने में न करें ये कामधर्म शास्त्रों में सावन के महीने में कुछ कामों को करने की मनाही होती है।शरीर पर तेल नहीं लगाते: धर्म शास्त्र में कहा गया है कि सावन के महीने में शरीर पर तेल नहीं लगाते हैं। इस पवित्र महीने में शरीर पर तेल लगाना अशुभ माना जाता है।दिन में न सोएं:धर्म शास्त्रों के अनुसार सावन के महीने में दिन के समय नहीं सोना चाहिए।

शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए केतकी का फूल 
सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा के दौरान कुछ खास चीजों को अर्पित करने से बचना चाहिए। शिवलिंग पर हल्दी और सिंदूर आदि नहीं चढ़ाना चाहिए।
किसी से बुरा व्यवहार न करें
सावन महीने में किसी से बुरा व्यवहार न करें और न ही किसी का अपमान न करें। इन दिनों किसी से भी वाद-विवाद से बचना चाहिए। अपनी वाणी पर संयम बरतना चाहिए। सावन महीने में बुरे कर्मों और यहां तक कि बुरे विचारों से भी बचना चाहिए। परिवार, गुरु, मेहमान या किसी भी व्‍यक्ति का अपमान न करें।
सावन में न करें इनका सेवन
खाने में बैंगन को खाने की मनाही है। बैंगन को अशुद्ध माना जाता है। बैंगन को अशुद्ध सब्जी के रूप में माना जाता है। सही कारण है कि द्वादशी और चतुर्दशी के दिन लोग बैंगन का सेवन नहीं करते हैं।
मांस मदिरा से रहें दूर
सावन के महीने में भूलकर भी मांस-मदिरा का सेवन न करें। सावन के महीने में बाल भी नहीं काटे जाते हैं। अगर संभव हो तो दाढ़ी भी न बनाएं।
भगवान शिव को अर्पित करें ये चीजें 
शिव को सावन मास में पूजा के दौरान धतूरा, बेलपत्र, सुपारी,भांग के पत्ते, बेल की पत्तियां,दूध, पंच अमृत,नारियल काले तिल और गुड़ आदि अर्पित करना शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे भगवान शिव की कृपा सदैव बनी रहती है।
सावन का महत्व
हिंदू धर्म में सावन के महीने का विशेष महत्व है।  इस पूरे माह में श्रद्धा भाव से शिव पूजन करना फलदायक माना जाता है। सावन के हर सोमवार में बेल पत्र से भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। रिपोर्ट अशोक झा

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