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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: पसमांदा मुसलमानों के प्रति उदासीनता

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: पसमांदा मुसलमानों के प्रति उदासीनता
-मुस्लिम समाज जाति, पंथ और नस्ल के आधार पर मसलकों और फिरकाओं में बंटा हुआ है
-अध्यक्ष हमेशा सुन्नी संप्रदाय के देवबंदी या फिर नदवी स्कूल से आते हैं जो सबसे प्रभावशाली हैं
अशोक झा, सिलीगुड़ी: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यानी एआईएमपीएलबी अक्सर मुस्लिम समाज को डराने और भ्रमित करने में लिप्त पाया गया है। लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई भारतीय संसद उनके पक्ष में नहीं है। बोर्ड का यह भी दावा है कि यह सभी मुसलमानों (अशरफ और पसमांदा दोनों का गठन) की प्रतिनिधि सभा है और इस्लामी शरिया कानून द्वारा निर्धारित उनके व्यक्तिगत और सामाजिक मूल्यों की देखभाल करता है। लेकिन हकीकत यह है कि मुस्लिम समाज जाति, पंथ और नस्ल के आधार पर मसलकों और फिरकाओं में बंटा हुआ है। पसमांदा (पिछड़े, दलित और आदिवासी) मुसलमानों के अनुचित प्रतिनिधित्व के कारण बोर्ड को अपने संगठन में स्तरीकरण का एहसास नहीं है। बोर्ड के अध्यक्ष हमेशा सुन्नी संप्रदाय के देवबंदी या फिर नदवी स्कूल से आते हैं जो सबसे प्रभावशाली हैं। हालांकि वे सुन्नियों के बरेलवी समुदाय की तुलना में कम संख्या में हैं। इसके अलावा, बोर्ड के उपाध्यक्ष हमेशा शिया संप्रदाय से होते हैं, हालांकि वे सुन्नी संप्रदाय के सबसे छोटे फ़िरक़ा की तुलना में तुलनात्मक रूप से कम होते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से शियाओं को सुन्नियों के बराबर माना जाता है।उल्लेखनीय है कि स्वदेशी पसमांदा मुसलमानों की भाषा, सभ्यता और संस्कृति भारतीय भूमि के अन्य मूल निवासियों की तरह ही है लेकिन अशरफ मुस्लिम उलेमा इसे गैर-इस्लामी और हिंदुत्व की प्रथा कहते थे। अशरफ उलेमा इस्लाम के नाम पर अपनी अरब-ईरानी संस्कृति को भारतीय पसमांदा मुसलमानों पर थोपने की कोशिश करते रहे हैं।  जबकि इस्लाम में वर्णित सिद्धांत ‘उर्फ’ किसी विशेष क्षेत्र के रीति-रिवाजों का पालन करने की अनुमति देता है इस शर्त के साथ कि वे इस्लाम के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं  हैं।  उल्लेखनीय है कि एआईएमपीएलबी भारतीय मुसलमानों के जाति स्तरीकरण से अवगत है, जैसा कि बोर्ड द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘मजमुआ-ए-कवानीन-ए-इस्लामी’ में विवाह से संबंधित एक अध्याय है, जो नस्लीय जातीय, उच्च-निम्न, स्वदेशी-विदेशी,भेदभाव आदि को मान्यता देता है और निचली-उच्च जाति के बीच विवाह को अनैतिक और गैर-इस्लामी मानते हैं। इसके अलावा, बोर्ड महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर चयनात्मक है और केवल उच्च वर्ग अशरफ से संबंधित लोगों को शामिल करता है।  बोर्ड में लोकतंत्र  का पूर्ण अभाव है क्योंकि पदाधिकारियों की नियुक्ति वंशानुक्रम, नस्ल के आधार पर की जाती है और कभी-कभी अरब-ईरानी जाति के मुसलमानों के करीबी रिश्तेदारों को नियुक्तियों के लिए माना जाता है, किसी भी प्रकार के चुनाव या लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनदेखी करते हुए, जो कि कुरान की शिक्षाओं के सख्त खिलाफ।  इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि एआईएमपीएलबी मुसलमानों के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।  इसका एकमात्र उद्देश्य इस्लाम की आड़ में अरब-ईरानी शासक वर्ग, अशरफ मुसलमानों के हितों की रक्षा करना है।
क्या है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भारत में मुसलमानों की ऐसी प्रतिनिधि संस्था मानी जाती है जो मुसलमानों के मुद्दों के निपटारे के लिए मुस्लिम कानून या शरीयत की वकालत करती है। भारत में मुसलमानों से जुड़े सिविल मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत एक्ट 1937 से परिचातित किए जाते हैं। ये मुसलमानों की शादी, मेहर, तलाक, मेंटेनेंस, वक्फ, प्रॉपर्टी और विरासत से जुड़े होते हैं। मुसलमानों के अनुसार शरीयत में इन मुद्दों से जुड़े तमाम सवालों के जवाब दिए गए हैं। इसलिए इनके निपटारे भी शरीयत के जरिये ही होने चाहिए। 
क्यों और कैसे हुई इसकी स्थापना?

पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना साल 1972 में हुई। कांग्रेस की उस वक्त की सरकार की तरफ से बच्चों को गोद लेने के लिए एक कानून संसद के जरिये ला रही थी। कांग्रेस सरकार के कानून मंत्री एचआर गोखले थे। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ में बच्चे को गोद लेने की कोई वैधता नहीं है। मुसलमानों का कहना था कि परवरिश की नजर से तो बच्चे को गोद लिया जा सकता है, लेकिन गोद लेने वाले माता-पिता का नाम उसे नहीं मिल सकता है। पैतृत संपत्ति में भी इसका कोई अधिकार नहीं बनता। इस संशोधन कानून के बारे में उस समय के उलेमा को लगा कि इसके जरिए इस्लाम धर्म के अनुयायियों पर बच्चे को गोद लेने के प्रावधान लादे जाएंगे जो शरीयत के खिलाफ होगा। मुसलमानों की तरफ से हुकूमत को प्रस्ताव दिया था कि इससे हमें राहत दी जाए। लेकिन जब बात नहीं मानी गई तो मुसलमानों की जितनी बड़ी-बड़ी संस्थाएं थी सब बम्बई में जमा हुए। उस वक्त तो सरकार ने अपने कदम वापस ले लिए थे, लेकिन उसी से यह बात निकली कि शरीयत में हस्तक्षेप करने की कोशिशें आगे भी हो सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि कोई ऐसी संस्था हो, जो इस पर सतत निगरानी रखे।  तब उन्होंने फैसला किया कि शरीयत को बचाने के लिए एख अपेक्स बॉडी बनानी चाहिए। यह बोर्ड शिया- सुन्नी और सुन्नियों में जितनी शाखाएं हैं, उन सबकी नुमाइंदगी करता है। उनके प्रतिनिधि बोर्ड के सदस्य होते हैं। बतौर सदस्य हाल के वर्षों में इसमें महिलाओं की नुमाइंदगी बढ़ाई गई है। अक्सर विवादों में रहने के बावजूद इसके खाते में कई अच्छे काम भी दर्ज हैं। बोर्ड कन्या भ्रूण हत्या, शादियों में दहेज और दूसरे गैर जरूरी खर्च के खिलाफ जागरूकता अभियान भी चला रहा है।

एआईएमपीएलबी का नेतृत्व कौन करता है

पर्सनल लॉ बोर्ड का दावा है कि यह भारत में बसे सभी मुसलमानों (विदेशी अशरफ और स्वदेशी पसमांदा) की प्रतिनिधि सभा है। जो शरिया द्वारा निर्धारित उनके व्यक्तिगत और सामाजिक मूल्यों की देखभाल करने के लिए काम करती है। इसके अलावा बोर्ड मुसलमानों की ओर से न केवल देश के बाहरी और आंतरिक मामलों पर अपनी राय देता है, बल्कि राष्ट्रव्यापी आंदोलन, सेमिनार और बैठकों के माध्यम से उन्हें लागू भी करता है। यदि हम संगठनात्मक संरचना को देखें, तो AIMPLB ने मसलकों (एक ही संप्रदाय के तहत विभिन्न समूहों / विचारधाराओं) और फ़िरक़ा (विभिन्न संप्रदायों) के बीच अंतर को स्वीकार किया है और उनकी आबादी के आधार पर, विभिन्न मसलकों के उलेमाओं (विद्वानों) को प्रतिनिधित्व दिया है। हालांकि बोर्ड के अध्यक्ष हमेशा सुन्नी संप्रदाय के देवबंदी/नदवी स्कूल से आते हैं। यह भारत में सर्वविदित है कि सुन्नी इस्लाम का सबसे बड़ा संप्रदाय हैं और देवबंदी/नदवी समुदाय सबसे प्रभावशाली हैय़ हालांकि वे बरेलवी सुन्नियों से अधिक नहीं हैं। बोर्ड के उपाध्यक्ष हमेशा शिया संप्रदाय से होते हैं, हालांकि शिया सुन्नी संप्रदाय के सबसे छोटे फ़िरक़ा से कम संख्या में हैं। लेकिन वैचारिक रूप से शियाओं को सुन्नियों के बराबर माना जाता है।

कौन-कौन इससे जुड़े 

मौजूदा वक्त में एआईएमपीएलबी को एक अध्यक्ष, 5 उपाध्यक्ष, एक महासचिव, 4 सचिव, एक कोषाध्यक्ष और 39 सदस्य मिलकर चलाते हैं। संस्था मॉडल निकाहनामा भी लागू कर चुकी है। संस्था के मौजूदा अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी के अलावा उपाध्यक्ष, सचिव और सदस्य के रूप में मौलाना कल्बे सादिक, एडवोकेट जफरयाब जिलानी, असदउद्दीन औवेसी, कमाल फारुकी, मौलाना महमूद मदनी और मौलाना राशिद फिरंगी महली भी जुड़े हुए हैं।

सीएए से लेकर कोर्ट के फैसलों तक पर उठाते हैं सवाल 

समान नागरिक संहिता और परिवार नियंत्रण कार्यक्रम अमली जामा नहीं पहन सका है। यह लोग अयोध्या पर कोर्ट के फैसले पर उंगली उठाते हैं तो हिजाब पर कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसले पर भी सियासी रंग चढ़ा देते हैं। यही लोग सीएए और एनआरसी के खिलाफ लोगों को बरगलाते हैं। हाल ही में हिजाब को लेकर बवाल भी ऐसी सोच वालों की ही देन थी। देश के मुसलमान अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के मामले में वर्ष 1857 और 1947 से भी ज्यादा मुश्किल हालात से गुजर रहे हैं। ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने देश के सभी जिलों में दारुल कजा यानी शरिया अदालत खोलने की बात कही थी। जहां इस्लाम के कानून यानी शरीयत के हिसाब से मामलों को सुना जाएगा। रिपोर्ट अशोक झा

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