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ज्योति बसु के जन्मदिन पर विशेष

ज्योति बसु के जन्मदिन पर विशेष

एक ऐसा नेता जिन्हें मिला था चार चार बार प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव

– पार्टी के लिए पद को ठुकराया आज की राजनीति में मील का पत्थर

अशोक झा सिलीगुड़ी: आज भले ही बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन नहीं है लेकिन आज भी पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु जैसे नेता आज की राजनीति में मील के पत्थर साबित हो रहे हैं। यह बात इसलिए मायने रखता है क्योंकि आज सत्ता के पद पाने के लिए पार्टी के साथ नेता गद्दारी तक करने से नहीं चूकते जबकि ज्योति बसु और चार चार बार प्रधानमंत्री का ऑफर मिला लेकिन उन्होंने पार्टी के निर्देशों का पालन करते हुए सिर्फ पद को ठुकरा दिया। ज्योति बसु इसके अलावा गठबंधन की सरकार को चलाने के लिए भी जाने जाते रहे हैं। चार दशकों तक उनके द्वारा गठबंधन कि सरकार और पार्टी को चलाने का अनुभव आज भी शीर्ष नेता नहीं भूल पा रहे हैं। इस बात को उनके करीबी रहे सिलीगुड़ी के पूर्व मेयर और राज्य के पूर्व शहरी विकास मंत्री अशोक नारायण भट्टाचार्य भी मानते हैं। उनके जन्म जयंती पर पार्टी कार्यालय के सामने उन्हें लाल सलाम दिया जा रहा है। भारत की राष्ट्रीय राजनीति में कई क्षेत्रीय नेता ऐसे रहे हैं जिन्होंने देश की राजनीति को एक दिशा प्रदान करने का काम किया है। इसमें एक नेता पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु भी हैं। लेकिन बसु दा को उनको मिले देश के प्रधानमंत्री बनने के एक मौके के लिए ज्यादा जाना जाता है जो उन्होंने गंवा दिया था। 8 जुलाई को उनका जन्मदिन  है। बासु दा को पश्चिम बंगाल के साथ देश की राष्ट्रीय राजनीति में दिए गए योगदान के लिए जाना जाता है।

वकालत की पढ़ाई और वामपंथ की ओर झुकाव
ज्योतिरेंद्र बासु का जन्म 8 जुलाई 1914 को बंगाली कायस्थ परिवार में कोलकाता में हुआ था। उनके पिता निशिकांत बसु एक डॉक्टर थे और उनका मां हेमलता बसु एक गृहणी। उनके बचपन के शुरुआती साल बंगाल प्रांत के ढाका जिले के बार्दी में बीता। लेकिन पढ़ाई कोलकाता में हुई जहां कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कानून की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गए और वहीं उनका झुकाव कम्युनिस्ट पार्टी की ओर हुआ। 1940 में वे बैरिस्टर बन कर भारत लौटे।
बंगाल की राजनीति के प्रमुख नेता

शुरु में ट्रेड यूनियन की राजनीति में संलग्न होकर बसु 1946 में राज्य की राजनीति में उतरे और डॉ बिधान चंद्र राय की लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान वे विपक्ष के नेता रहे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक रहे और 1977 तक वे बंगाल के प्रमुख नेता के तौर जाने जाते रहे। 1977 में मार्क्सवादी पार्टी की जीत केबाद वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने।

लंबे समय तक बंगाल के मुख्यमंत्री

ज्योति बसु देश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जो लगातार 25 साल तक किसी राज्य के मुख्यमंत्री बने रहे। शायद यही वजह रही कि उनका कद एक राष्ट्रीय स्तर तक जाता दिखने लगा था। उनका राष्ट्रीय राजनीति में एक अलग कद बन गया था. लेकिन वे ना तो नेहरू या किसी बड़े राष्ट्रीय नेता की तरह करिशमाई व्यक्तित्व के धनी थे, ना ही उनमें जेपी जैसा औरा था जो लोगों को उनकी ओर खींच सके। ना ही उनके पास ऐसी कोई राजनैतिक कार्यक्रम या नीति थी जो देश भर में लोगों को लुभा पाती।

ज्योति बसु शुरु से पश्चिम बंगाल की राजनीति के शीर्ष नेता के तौर पर गिने जाते रहे। 
बंगाल के लिए योगदान

किन बासु दा ने पश्चिम बंगाल को ही ऐसा आकार दिया और ऐसी नीतियां अपनाई जिससे बंगाल की वह गति होने से बच गई जो विशेषज्ञों को मुताबिक हो सकती थी। यह बसु दा और उनकी पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ताओं के प्रयास ही थे जो बंगाल जहां से नकस्लवाद का उदय हुआ, नलक्स प्रदेश नहीं बना, बल्कि गांव और शहर के लोग वामपंथ और बासु दा से जुड़ रहे सके।

नक्सलवाद से बचाया: राजनैतिक इतिहास के जानकार बताते हैं कि अगर 1980 के दशक में नक्सलवाद अपने पैर पश्चिम बंगाल में पसारने में कामयाब हो जाता, तो शायद आज बंगाल दूसरा छत्तीसगढ़ होता जहां नक्सलियों का जड़ें गहरी हो गई थीं. बासु दा और उनकी वामपंथी सरकार पर यह इल्जाम लगाया जाता है कि उन्होंने प्रदेश का विकास नहीं किया, लेकिन 1960 और 70 के दशक में बंगाल का जो हाल था, उसकी तुलना में जो विकास हुआ उसकी ही बदौलत लोग लंबे समय तक बासु दा को बंगाल का मुख्यमंत्री चुनते रहे.

1990 के दशक की गठबंधन सरकारों के दौर में पता चला कि राष्ट्रीय स्तर पर ज्योति बसु का कद कितना बड़ा है 
गंठबंधन सरकारों का दौर:  इस बीच ज्योति बसु मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता तो रहे ही, राष्ट्रीय राजनीति में भी बंगाल और देश के वामपंथ के प्रमुख नेता के तौर पर जाने जाते रहे। 1990 के दशक में जब कांग्रेस के हाथ से बहुमत दूर हुआ और बाकी दल बड़ी पार्टी के रूप में स्थान नहीं बना सके तब देश के केंद्र में गंठबंधन सरकारों का दौर चला। गंठबंधन सरकारों के दौर में वामपंथी दलों के लिए आसान दौर नहीं था क्योंकि उन्हें कई विपरीत विचारधारा वाले दलों से तालमेल करना पड़ा था। लेकिन फिर भी छोटे-छोटे दलो के बीच बसु की माकपा एक प्रभावी दल के रूप में सामन आई।

बार बार प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव

बहुत कम लोग जानते हैं कि बसु को एक बार नहीं बल्कि चार बार देश का प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव मिला था। 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस प्रम्ख राजीव गांधी ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन बसु की पार्टी ने उसे ठुकरा दिया। इसके सात महीने बाद चंद्रशेखर की सरकार गिरने पर राजीव गांधी ने फिर से बसु को वही प्रस्ताव दिया। जिसे फिर से ठुकरा दिया गया। इसके बाद 1996 में एक बार फिर ऐसी स्थिति बनी की कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही स्वतंत्र रूप से सरकार बनाने की हालत में नहीं थीं। ऐसे में जनता दल के साथ छोटे छोटे दलों और वामपंथी दलों ने मिलकर एक संयुक्त मोर्चा बनाया जिसमें एक बार फिर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया। इस बार प्रस्ताव पर बहुत ही गंभीरता से विचार हुआ और अंततः पार्टी ने ही इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। 1999 में एक बार फिर बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया गया, इस बार बसु और उनकी पार्टी दोनों मान गए, लेकिन तब कांग्रेस के समर्थन की जरूरत थी और कांग्रेस ने साथ देने से मना कर दिया। इस तरह बसु को चार मौकों पर बार- बार प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया था। रिपोर्ट अशोक झा

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