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पुलिस कमिश्नर और आईजी नार्थ बंगाल ने लगाया झाड़ू

पुलिस कमिश्नर और आईजी नार्थ बंगाल ने लगाया झाड़ू
– भक्तों को दर्शन देने रथ पर सवार होकर शहर में निकले जगन्नाथ
अशोक झा, सिलीगुड़ी: पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा इस्कॉन मंदिर सिलीगुड़ी।  जगन्नाथ रथयात्रा के मौके पर मंदिर का पूरा परिसर भक्तों से खचाखच भरा हुआ है। रथ यात्रा का शुभारंभ करने सिलीगुड़ी पुलिस कमिश्नर गौरव शर्मा तथा नार्थ बंगाल के आईजी देवेंद्र प्रताप सिंह वहां मौजूद थे। मंगला आरती के साथ विधिवत पूजा अर्चना की। परंपरा के अनुसार दोनों ने रथ के मार्ग पर झाड़ू लगाकर साफ किया। भगवान जगरनाथ के जयकारे के साथ  हरि बोल हरि बोल की गूंज मंदिर परिसर में गूंजने लगा श्रद्धालु भक्त झूमते नजर आए। उसके बाद मंदिर परिसर से रथ धीरे-धीरे भक्तों के दर्शन के लिए शहर और बढ़ने लगा।मालूम हो कि जब तीनों रथ के तैयार हो जाते हैं तो इसकी विशेष पूजा होती है जिसे ‘छर पहनरा’ कहा जाता है। ये पूजा पुरी के गजपति राजा की पालकी करती है और फिर पुरी के राजा सोने की झाड़ू से रथ यात्रा का मार्ग साफ करते हैं और उसके बाद रथ यात्रा आगे बढ़ती है। कहते हैं जो भी रथ यात्रा में शामिल होता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। रथयात्रा उत्सव में भगवान जगन्नाथ को रथ पर विराजमान करके पूरे नगर में भ्रमण कराया जाता है। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के रथ भी निकाले जाते हैं। रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुण्डिच्चा मंदिर तक पहुंचती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकालने की यह परंपरा काफी पुरानी है और वर्षों से चली आ रही है। इस पवित्र रथ यात्रा से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित है। आइए जानते हैं कैसे शुरू हुई विश्व प्रसिद्ध जगन्ननाथ यात्रा और क्या है इसका इतिहास। कलयुग के प्रारंभिक काल में मालव देश पर राजा इंद्रद्युम का शासन था। वह भगवान जगन्नाथ का भक्त था। एक दिन इंद्रद्युम भगवान के दर्शन करने नीलांचल पर्वत पर गया तो उसे वहां देव प्रतिमा के दर्शन नहीं हुए। निराश होकर जब वह वापस आने लगा तभी आकाशवाणी हुई कि शीघ्र ही भगवान जगन्नाथ मूर्ति के स्वरूप में पुन: धरती पर आएंगे। यह सुनकर वह खुश हुआ।
आकाशवाणी के कुछ दिनों बाद एक बार जब इंद्रद्युम पुरी के समुद्र तट पर टहल रहा थे, तभी उन्हें समुद्र में लकड़ी के दो विशाल टुकड़े तैरते हुए दिखाई दिए। तब उन्हें आकाशवाणी की याद आई और सोचा कि इसी लकड़ी से वह भगवान की मूर्ति बनाएंगे। फिर वह लकड़ी को महल में अपने साथ उठा लाएं  तभी भगवान की आज्ञा से देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा वहां बढ़ई के रूप में प्रगट हुए और उन्होंने उन लकड़ियो से भगवान की मूर्ति बनाने के लिए राजा से कहा। राजा ने तुरंत इसकी आज्ञा दी।  लेकिन मूर्ति बनाने से पहले बढ़ई रूपी विश्वकर्मा ने एक शर्त रख दी। शर्त के मुताबिक वह मूर्ति का निर्माण एकांत में ही करेगा और यदि निर्माण कार्य के दौरान कोई वहां आया तो वह काम अधूरा छोड़कर चला जाएगा। राजा ने शर्त मान ली। इसके बाद विश्वकर्मा ने गुण्डिचा नामक जगह पर मूर्ति बनाने का काम शुरू कर दिया। कुछ दिन बाद एक दिन राजा भूलवश जिस स्थान पर विश्वकर्मा मूर्ति बना रहे थे वहां पहुंच गए। तब उन्हें देखकर विश्वकर्मा वहां से अन्तर्धान हो गए और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी रह गईं। तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में स्थापित होना चाहते हैं। तब राजा इंद्रद्युम ने विशाल मंदिर बनवाकर तीनों मूर्तियों को वहां स्थापित कर किया। साथ यह भी आकाशवाणी हुई कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी जन्मभूमि जरूर आएंगे। स्कंदपुराण के उत्कल खंड के अनुसार राजा इंद्रद्युम ने आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रभु के उनकी जन्मभूमि जाने की व्यवस्था की। तभी से यह परंपरा रथयात्रा के रूप में चली आ रही है। रथं यात्रा की मे किसी प्रकार का कोई रुकावट ना हो इसके लिए पूरे शहर में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई है। रिपोर्ट अशोक झा

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