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“पिता की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं होंगी” इसी समर्पण का नाम है देशभक्ति।

हम रहे न रहे, हिन्दोस्तां रहे
लहराते तिरंगे की दास्तां रहे!

देश की एक बेटी, जो दूर देश जापान में अपने वतन भारत को हॉकी सीरीज के निर्णायक मैच को जिताने की तैयारी कर रही हो, उसके घर से उसे खबर मिलती है कि उनके पिताजी जिंदगी की जंग हार गए हैं…

जब बीते रविवार सारा राष्ट्र क्रिकेट वर्ल्ड कप में खोया हुआ था तो हिंदुस्तान की बेटियों ने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसे महिला हॉकी के इतिहास में किसी करिश्मे से कम नहीं कहा जा सकता है।

महिला हॉकी टीम ने विश्व हॉकी के प्रतिष्ठित एफआईएच टूर्नामेंट के फाईनल में जापान की टीम को जापान की धरती पर 3-1 से करारी शिकस्त देते हुये विजयश्री प्राप्त की।

फाईनल से पहले महिला हॉकी टीम का सेमीफाइनल मैच चिली की मज़बूत टीम के साथ था। तिरंगे की शान को बरकरार रखने का जुनून लिए हिन्द की बेटियां चिली टीम को कड़ी टक्कर देने का संकल्प ले चुकी थी। उस मैच को जीतते ही हिंदुस्तान की महिला टीम का ओलम्पिक के लिये क्वालीफाई करना भी निश्चित था।

वहीं मैच से एक दिन पहले मिज़ोरम की 19 वर्षीय हॉकी खिलाड़ी लारेम सैमी को उनके घर से एक कॉल आया। लारेम को लगा के शायद उनके परिजनों ने उन्हें कल के मैच के लिये शुभकामनाएं प्रेषित करने के लिये कॉल किया है। लारेम ने फोन उठाया… हहलो, हहलो डबडबाती आवाज़ में दूसरी ओर से कोई कुछ कहने का प्रयास कर रहा था। कुछ क्षण शांति रही और फिर लारेम को सूचित किया गया कि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे। हार्ट अटैक से उनका निधन हो चुका है। एक क्षण में लारेम की दुनिया हिल चुकी थी।

वह उस शख्स को खो चुकी थी जिसने उन्हें उंगली पकड़ कर चलना सिखाया था। जिसने पहली बार उनके हाथों में हॉकी स्टिक थमाई थी।

अपने बाबा की लाडली को इस बात पर विश्वास करने में काफी वक्त लगा के अब उनके पिता इस दुनिया में नहीं हैं। पिता के साथ बिताए हर स्वर्णिम पल की यादें आँखों से बह रही थी।

लारेम का चयन हिंदुस्तान की महिला हॉकी टीम में उसके बेहतरीन खेल के बलबूते किया गया था। कोच और टीम मैनेजमेंट ने कहा के लारेम तत्त्क्षण अपना सामान बांध लें और अगली फ्लाइट से हिंदुस्तान लौट जायें ताकि वह अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल हो सकें।

टीम इंडिया यह सोच कर हताश हो गयी कि अगले दिन एक महत्वपूर्ण मुकाबला है और अब उनकी चोटी की खिलाड़ी उनके बीच नहीं होगी……..

लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी ने भी नहीं की थी। लारेम ने कहा के वह राष्ट्र का सम्मान दांव पर लगा कर पिता की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं होंगी। वह वतन वापिस नहीं जाएंगी। वह अपनी टीम के साथ रहेंगी और अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा की जंग में अपनी टीम को अकेला नहीं छोड़ेंगी।

उन्होंने कहा के उनके पिता उन्हें देख रहे होंगे और वह इंडिया को यह मुकाबला जीता कर उन्हें प्राउड करवाना चाहती है।

अगले दिन अपना सारा दुःख और सारी पीड़ा भूल कर लारेम मैदान में उतरी, जम कर खेली और हिंदुस्तान विजयी हुआ। मैदान में जहां अन्य खिलाड़ी जश्न मनाते दिखे वहाँ अपने पिता को खो चुकी इस बिटिया के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान दिखाई दी.. और आखिर FIH कप के फाईनल मैच में लारेम के उत्कृष्ट प्रदर्शन से हिंदुस्तान ने जापान को उसकी ही धरती पर पछाड़ दिया।

लारेम के इसी जज्बे का नाम है वास्तविक राष्ट्रवाद। इसी समर्पण का नाम है देशभक्ति। अपने पिता को खोने का दर्द अपने दिल में दबा कर देश की यह बिटिया तिरंगे की शान की लड़ाई लड़ती रही। हिन्दोस्तां का भविष्य लारेम जैसे असंख्य युवाओं पर टिका हुआ है जिनके लिए राष्ट्र की आन बान और शान से बढ़ कर कुछ भी नहीं है।

मंगलवार को जब लारेम अपने घर लौंटी तो उनके चेहरे पर एक तरफ देश के लिए खिताब जीतने का गर्व था तो दूसरी तरफ पिता को खोने का और अंतिम समय में उनके पास नहीं होने का दर्द भी था।

वे घर पहुँचते ही अपनी माँ से लिपटकर फफककर रो पड़ीं। मुझे देश की बेटी, मिज़ोरम की शान लारेम पर गर्व है। क्रिकेट के पीछे पागल इस देश में लारेम हम आपके सम्मान में शीश झुकाते हैं।

संग्रहित : सोशल मीडिया !

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