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यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह नहीं रहे !

यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह नहीं रहे। बीजेपी में उनकी छवि एक कट्टर हिंदूवादी नेता की रही।
सिलीगुड़ी: कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी, 1932 को अतरौली में हुआ था. उन्हें हिंदूवादी नेता के तौर पर जाता था। उन्होंने अलीगढ़ से बीए तक पढ़ाई की और समाज सेवा के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे।  1967 में कल्याण सिंह भारतीय जनसंघ के टिकट पर अतरौली विधानसभा से चुनाव लड़े और जीतकर विधानसभा पहुंचे।

1985 में की जबरदस्त वापसी: कल्याण सिंह 1980 से लगातार इस सीट से जीतते रहे. 1980 के विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह को अतरौली से हार का मुंह देखना पड़ा. जानकारों की मानें तो इसको एंटी-इनकंबेसी का असर माना गया और कल्याण सिंह ने भाजपा के टिकट पर 1985 के विधानसभा चुनाव में जोरदार वापसी करते हुए फिर जीत हासिल की. तब से लेकर 2004 के विधानसभा चुनाव तक कल्याण सिंह अतरौली से लगातार विधायक बनते रहे।

मैंने उनसे कहा कि ये बात रिकॉर्ड कर लो चह्वाण साहब कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा.”
ये शब्द देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह के हैं, जिन्होंने बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जैसे ही बाबरी मस्जिद की पहली ईंट गिरी. कल्याण सिंह ने अपने लेटर पैड पर अपना इस्तीफा लिख दिया. उन्होंने मस्जिद ढहा रहे कार सेवकों पर गोली चलवाने से साफ मना कर दिया था.

अलीगढ़ के अतरौली से शुरू हुआ सफर

उत्तर प्रदेश को राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाता है. कल्याण सिंह भी इसी प्रयोगशाला से निकले. 1960 के दशक में जनसंघ ने यूपी में पिछड़े वर्ग से आने वाले युवा नेता की तलाश शुरू की. खोज अलीगढ़ के अतरौली में जन्मे कल्याण सिंह पर खत्म हुई. तेज-तर्रार कल्याण सिंह जनसंघ के खाचे में फिट हो गए हैं. क्योंकि वो लोधी समाज से आते थे. यादवों के बाद यूपी में तब सबसे अधिक आबादी लोधी की ही थी.

पहली हार और फिर जीत का कारवां

जनसंघ ने 1962 के चुनाव में उन्हें अतरौली से चुनावी मैदान में उतार दिया. पहली चुनावी बाजी खेलने उतरे कल्याण सिंह सोशलिस्ट पार्टी के बाबू सिंह से मात खा गए. मगर उन्होंने अपने क्षेत्र को नहीं छोड़ा. गांव-गांव घूमा और जब पांच साल बाद चुनाव हुए तो कल्याण सिंह के माथे पर जीत की पगड़ी बंध गई.

ये कल्याण सिंह की शुरुआत थी. इसके बाद कल्याण सिंह अतरौली से बार-बार जीते और लगातार जीते. 1967, 1969, 1974 और 1977. लगातार चार बार विधायक बने. 1980 में वो कांग्रेस के अनवर खान से हार गए. मगर पहली बार की तरह ही कल्याण सिंह ने 1985 में बीजेपी के टिकट पर वापसी की और फिर 2004 तक अतरौली से विधायक रहे.

यूपी में राम मंदिर मुद्दा

1980 में बनी बीजेपी को 1984 में अयोध्या राम मंदिर का मुद्दा मिला. साल 1986 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के राज में मंदिर के दरवाजों को खेलने का आदेश एक जिला जज ने दिया. हिंदुओं को पूजा करने की मंजूरी मिल गई. इसके बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी का गठन मुसलमानों ने कर लिया और पूजा को रोकने की मांग करने लगे.

राम मंदिर मुद्दा यूपी में बीजेपी के विस्तार का अहम हथियार बना. लालकृष्ण आडवाणी ने देश में रथयात्रा निकाली. 30 अक्टूबर 1990 को यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या मे जुटे कार सेवकों पर गोली चलवाई दी. राम मंदिर मुद्दा आंदोलन की शक्ल लेने की ओर बढ़ चला.

बीजेपी के रथ के सारथी बने कल्याण

खैर, विषायांतर से आगे बढ़ते हैं. इन सब के बीच साल 1991 में यूपी विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल बजा. देश में मंडल और कमंडल की सियासत का आगाज हो चुका था. सवर्णों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी ने मौके की नजाकत को समझा और कल्याण सिंह को पिछड़ों का चेहरा बनाकर राजनीति की प्रयोगशाला में उतार दिया.

कल्याण सिंह की छवि पिछड़ों के नेता के साथ -साथ एक फायर ब्रांड हिंदू नेता के तौर पर मजबूत हुई. चुनाव यूपी की 425 में से 221 सीटें जीतकर बीजेपी सत्ता के रथ पर सवार हुई और रथ पर कल्याण सिंह को बिठाया.

मस्जिद गिरते ही छोड़ दी सीएम की कुर्सी

कल्याण सिंह के कार्यकाल में ही वो दिन आया, जिसने देश की सियासत को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. बीजेपी के नेताओं ने अपने चुनावी भाषण में राम मंदिर बनाने की बात पर खूब तालियां बटोरी थीं. चुनाव में बड़ा समर्थन इस मुद्दे ने भी जुटाया था. 6 दिसंबर 1992 को कार सेवकों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दी. मस्जिद गिरते हुए कल्याण सिंह ने सीएम के पद से इस्तीफा दे दिया.

“बाबरी मस्जिद विध्वंस भगवान की मर्जी”

मस्जिद विध्वंस और सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद मीडिया से बातचीत में कल्याण सिंह ने कहा था ‘बाबरी मस्जिद विध्वंस भगवान की मर्जी थी. मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है. कोई दुख नहीं है. कोई पछतावा नहीं है. ये सरकार राममंदिर के नाम पर बनी थी और उसका मकसद पूरा हुआ.

ऐसे में सरकार राम मंदिर के नाम पर कुर्बान. राम मंदिर के लिए एक क्या सैकड़ों सत्ता को ठोकर मार सकता हूं. केंद्र सरकार कभी भी मुझे गिरफ्तार करवा सकती है, क्योंकि मैं ही हूं, जिसने अपनी पार्टी के बड़े उद्देश्य को पूरा किया है.’

दूसरी बार बने सीएम और अटल से भिड़ गए

1997 में कल्याण सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने. मगर अपने दूसरे कार्यकाल में वो बीजेपी के दिग्गज नेताओं से भिड़ गए. कल्याण सिंह ने तो अटल बिहारी वाजेपयी के लिए कह दिया कि पहले एमपी बन पाएंगे तभी तो पीएम बनेंगे.

दरअसल, एक प्रेस कॉन्फ्रेस में कल्याण सिंह से पूछा गया कि आपको क्या लगता है कि वाजेपयी प्रधानमंत्री बन पाएंगे. इसपर कल्याण सिंह ने कहा था- “मैं भी चाहता हूं कि वे PM बनें, लेकिन PM बनने के लिए पहले MP बनना पड़ता है.”

तब वाजेपयी लखनऊ लोकसभा सीट सांसदी का चुनाव लड़ते थे. अपने दूसरे कार्यकाल में कल्याण सिंह ने स्कूलों में प्राथमिक कक्षाओं की शुरुआत भारतमाता पूजन से शुरू करे, ‘यस सर’ की जगह ‘वंदे मातरम’ बोलने पर भी खूब जोर दिया. ऐसे थे कल्याण सिंह.

News Co-Ordinator and Advisor, Khabar Aajkal Siliguri

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