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अमर शहीद मेजर दुर्गा मल्ल करोड़ो गोरखाओ के लिए प्रेरणा: सांसद और राजू बिष्ट ।

भानुभक्त समिति की ओर से रक्तदान शिविर का आयोजन
सिलीगुड़ी:  देश को आजादी में कई वीर सपूतों ने अपनी शहादत दी है। उन्हीं में से एक डोईवाला निवासी अमर शहीद मेजर दुर्गामल्ल भी शामिल हैं। जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंक कर देश के लिए अपनी शहादत भी दी थी। उनके इस बलिदान से देश के युवा पीढ़ी को प्रेरणा लेने की जरूरत है। यह कहना है सांसद राजू बिष्ट का।

मेजर दुर्गा मल के शहीदी दिवस के मौके पर भानुभक्त समिति की ओर से प्रधान नगर ने रक्तदान शिविर का आयोजन किया जा रहा है। बताया गया कि अमर शहीद मेजर दुर्गा मल्ल का जन्म डोईवाला (घिस्सरपड़ी) में एक जुलाई 1913 को गंगाराम मल्ल गोरखा परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही उनके अंदर देशभक्ति का जुनून सवार था। उस समय देश में आजादी की क्रांति की ज्वाला भड़क रही थी। अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे के साथ जगह-जगह जन आंदोलन हो रहे थे।

इस बीच वर्ष 1942 में वह सिगापुर में भारतीय फौज के गोरखा राइफल में हवलदार थे। इसके बाद वह देश को आजादी दिलाने के उद्देश्य से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिद फौज में भर्ती हो गए। आजाद हिद फौज में उन्हें गुप्तचर का प्रमुख कार्य सौंपा गया था। इस बीच भारत वर्मा सीमा पार कर गुप्तचरी कार्य के लिए आसाम में प्रवेश करते हुए ब्रिटिश फौज ने 27 मार्च 1944 को उन्हें बंदी बना लिया।

उसके बाद ब्रिटिश फौजी अदालत ने उन्हें मृत्युदंड की सजा दी गई। 25 अगस्त 1944 को जिला जेल दिल्ली में मेजर दुर्गा मल्ल को फांसी की सजा दे दी गई। जंग-ए-आजादी के निर्णायक संघर्ष में अपने जीवन को देश के लिए न्यौछावर करने वाले उत्तराखंड के महान सपूतों में से एक शहीद मेजर दुर्गा मल्ल भी थे। कई स्वतंत्रता सेनानियों की तरह उन्होंने भी देश की आन बान और शान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

मेजर दुर्गा मल्ल का जन्म देहरादून जनपद के विकास खंड डोईवाला के एक साधारण परिवार में 1913 में हुआ था। 1930 में बाल्यावस्था में दुर्गा मल्ल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आंदोलन से बेहद प्रभावित हुए। उस समय में वह नौंवी कक्षा में पढ़ रह थे। वर्ष 1931 में दुर्गा मल्ल गोरखा राईफल में भर्ती हो गए। नेताजी सुभाष चंद बोस से प्रभावित होकर उन्होंने भारत को स्वतंत्र देखने के लिए ब्रिटिश फौज को छोड़कर 1942 में आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए।

27 मार्च 1944 में कोहिमा मणिपुर में आजाद हिंद फौज के लिए जासूूसी करते हुए ब्रिटिश फौज ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेज सरकार ने क्षमा मांगने और भूल स्वीकार करने पर फांसी की सजा माफ कर देने का प्रस्ताव दुर्गा मल्ल के सामने रखा। अंग्रेजी हुकूमत के प्रस्ताव को ठुकराते हुए उन्होंने कहा कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

मेजर दुर्गा मल्ल ने अपने जीवन बलिदान से उत्तराखंड ही नही संपूर्ण राष्ट्र को गौरवान्वित कर दिया। केंद्र सरकार ने शहीद दुर्गा मल्ल की शहादत को नमन करते हुए संसद भवन में उनकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की।

News Co-Ordinator and Advisor, Khabar Aajkal Siliguri

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